Sunday, July 26, 2020

बाबा भुइंया मंदिर - जहां बहती है दूध की नदी

  • वैशाली जिले में है एक ऐसा मंदिर जहां बहती है दूध की नदी 
  • मंदिर के गर्भगृह  में विराजमान हैं  बाबा बसावन, बाबा बख्तौर और माता गहिल 
हाजीपुर प्रखंड के पानापुर लंगा पंचायत में पशुपालकों के देवता बाबा भुंइया का मंदिर है।यह मंदिर बहुत ही विशाल और रमणीय है। हजारों भक्त इस मंदिर में सोमवार और शुक्रवार को दुग्धाभिषेक करते हैं । यह मंदिर वैशाली तथा इसके आसपास के जिलों में पशुपालन से जुड़े किसानों के बीच आस्था का बहुत बड़ा केन्द्र है। इस क्षेत्र के छोटे-बड़े सभी पशुपालकों के यहां जब कोई गाय- भैंस बच्चा देती है तो उसका दूध भुइंया बाबा को अर्पित किया जाता है ।इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था है । इस क्षेत्र में बाबा भुइंआ की मान्यता लोक देवता के रुप में है । बाबा भुइंआ मंदिर के गर्भगृह में  बाबा बसावन, बाबा बख्तौर और माता गहिल विराजमान हैं । लोगों का ऐसा विश्वास है कि इस मंदिर में दुग्धाभिषेक करने से पशुओं को कोई बीमारी नहीं होती है । साथ ही पशुओं की उम्र लंबी होती है ।

कौन थे भुइंया बाबा

बाबा भुइंया के भक्त देसी वाद्ययंत्र मानर पर गीत गाते हुए मंदिर में प्रवेश कर दुग्धाभिषेक करते हैं । गीत में बाबा भुइंया के बहादुरी के किस्से को गाए जाते है । इन गीतों में बाबा बसावन , बाबा बख्तौर और माता गहिल का उल्लेख होता है।गीतों से ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि उन्होंने अपने पशुओं की रक्षा करने के लिए बड़ी लड़ाईयां लड़ी । इन गीतों में उनकी बहादुरी का बखान होता है। यदुवंश शिरोमणि बाबा बसावन और बाबा बख्तौर इन गीतों में कहा गया है ।

वसंत पंचमी और दशहरा पर मेला

वैसे तो सालों भर इस मंदिर परिसर तथा इसके आसपास मेले जैसा माहौल होता है।लेकिन साल में दो बार वंसत पंचमी और दशहरा के मौके पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है । यह मेला दो महीने तक लगता है।लकड़ियों और कृषि औजारों के लिए यह मेला बहुत ही लोकप्रिय है। खरीदारी करने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं।

कैसे पहंचे बाबा भुइंआ

सड़क और रेलमार्ग से बाबा भुंइया मंदिर स्थान बहुत ही आसानी से पहंचा जा सकता है। जिला मुख्यालय से बाबा भुइंया मंदिर की दूरी लगभग 12 किलोमीटर के आसपास है । हाजीपुर-ताजपुर राष्ट्रीय राजमार्ग स्थित बिदुपुर से उत्तर दिशा की ओर जानेवाली राजापाकड़ सड़क से भी जाया जा सकता है । इसके साथ हाजीपुर- महुआ राजकीय मार्ग पर स्थित सेन्दुआरी चौक से मंदिर आसानी से पहंचा जा सकता है । श्रद्धालु रेलमार्ग से भी बाबा भुइंया मंदिर आते हैं । बाबा भुइंया मंदिर से निकटस्थ रेलवे स्टेशन अक्षयवट राय स्टेशन है ।अक्षयवट राय स्टेशन से मंदिर की दूरी आठ किलोमीटर के करीब है। स्टेशन परिसर से ही  श्रद्धालु ऑटो से मंदिर आ सकते हैं ।
                        बाबा भुइंया मंदिर

बाबा बसावन ट्रस्ट करता है मंदिर का प्रबंधन 

बाबा भुइंया मंदिर की देखरेख बाबा बसावन ट्रस्ट करता है।इसके प्रबंधन के लिए इस बाबा बसावन ट्रस्ट का गठन किया गया है। जिस दूध से पशुपालक भाई मंदिर के गर्भगृह में विराजमान वावा बसावन, बाबा बख्तौर और माता गहिल का दुग्धाभिषेक करते हैं उसे मामूली दर पर लोग प्रसाद के रुप में खरीदते हैं । इससे जो आमदनी होती है उसे जनकल्याण के कामों में खर्च किया जाता है ।

Thursday, July 23, 2020

राजस्थान में कांग्रेस ने अपने पैर पर मार ली कुल्हाड़ी

  • दिसंबर 2018 में विधानसभा चुनाव के दौरान पायलट ने पूरे चुनाव को फ्रंट से लीड किया था।

  • सचिन पायलट के कांग्रेस छोड़ने से गुर्जर भविष्य में कांग्रेस से दूर हो सकते हैं ।

कांग्रेस आलाकमान ने सचिन पायलट, महाराजा विश्वेन्द्र सिंह व रमेश मीणा को उनके पद से हटा दिया है। साथ ही युवक कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष मुकेश भाकर व सेवादल अध्यक्ष राकेश पारीक को भी उनके पद से हटा दिया है। इसके बाद राज्य के शिक्षा राज्य मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा को प्रदेश कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया गया है। इनके स्थान पर विधायक गणेश घोधरा को युवक कांग्रेस व हेमसिंह शेखावत को सेवादल का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है।एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष अभिमन्यु पूनिया ने भी पायलट के समर्थन में अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

अभी पूरा देश कोरोना से जूझ रहा है । संक्रमण के दौर में जहां सरकार को अपनी पूरी ताकत कोरोना पर काबू पाने के प्रयास करने में लगानी चाहिए। वहींं गहलोत सरकार के मंत्री आपस में ही लड़ रहे हैं। और प्रदेश में कोरोन तेजी से अपने पैर पसार रहा है ।प्रदेश में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या 25 हजार की संख्या को पाकर चुकी है। विधानसभा चुनाव के बाद जहां सचिन पायलट मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। वहींं अशोक गहलोत दिल्ली में जोड़-तोड़ कर मुख्यमंत्री बन गए थे। राजस्थान में तब से ही दोनों नेता एक दूसरे को कमजोर करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं।

कांग्रेस आलाकमान द्वारा राजस्थान में इस लड़ाई को रोकने की दिशा में कोई सकारात्मक कार्यवाही नहीं की गई थी, जिस कारण इनकी लड़ाई दिन प्रतिदिन बढ़ती ही गई। आज स्थिति सचिन पायलट द्वारा पार्टी से बगावत करने तक पहुंच गई है। जब राजस्थान में दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव मेंकांग्रेस को बहुमत मिला तो प्रदेश के हर कांग्रेसी को यही लग रहा था कि युवा नेता सचिन पायलट का मुख्यमंत्री बनना तय है । राजस्थान के प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव अविनाश पांडे गहलोत और पायलट में सुलह करवाते। मगर अविनाश पांडे सुलह कराने की बजाय खुद गहलोत के पक्ष में खड़े नजर आते रहे। राज्यसभा के चुनाव थे उस वक्त भी गहलोत और पायलट खेमे में खुलकर टकराव हुआ था।  

फरवरी 2014 में जब सचिन पायलट को राजस्थान कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया उस वक्त राजस्थान में कांग्रेस के मात्र 21 विधायक थे। दिसंबर 2013 में संपन्न हुए राजस्थान विधानसभा के चुनाव में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस बुरी तरह हार चुकी थी । ऐसे में सचिन पायलट ने प्रदेश अध्यक्ष बनते ही राजस्थान के हर जिले का धुआंधार दौरा किया व कार्यकर्ताओं से मिलकर उन्हें काम करने के लिए प्रेरित किया था। दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव में जब राजस्थान में कांग्रेस को बहुमत मिला तो प्रदेश के हर कांग्रेसी को यही लग रहा था कि युवा नेता सचिन पायलट का मुख्यमंत्री बनना तय है। क्योंकि राजस्थान में कांग्रेस को उबारने में जितनी मेहनत सचिन पायलट ने की थी। उतनी शायद ही अन्य किसी नेता ने नहीं की थी।

विधानसभा चुनाव  सचिन पायलट ने पूरे चुनाव को फ्रंट से लीड किया था। पायलट ने राजे सरकार की नाकामियों को आम जन जन तक पहुंचाया था। जिस कारण लोगों को लगा था कि एक युवा नेता के नेतृत्व में सरकार ब केनने से कांग्रेस पार्टी जनहित के मुद्दों पर काम करेगी।मगर जैसे ही चुनाव परिणाम कांग्रेस के पक्ष में आए। अशोक गहलोत ने अपने दिल्ली संपर्कों के बल पर मुख्यमंत्री बन गए। गहलोत के मुख्यमंत्री बनते ही पायलट समर्थको में जबरदस्त विरोध देखा गया था। मगर उस वक्त कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व कांग्रेस के अन्य बड़े नेताओं ने पायलट को मना कर उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी। इसके बाद 2018 में गहलोत के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेसी सभी 25 सीटों पर बुरी तरह हार गई थी...

ऐसा नहीं है कि सचिन पायलट ने यकायक बगावत कर दी हो। उन्होंने अपनी उपेक्षा की शिकायत बार-बार कांग्रेसी आलाकमान से की थी। मगर आलाकमान ने जो एक समन्वय समिति का गठन किया वह महज कागजी साबित हुई।मौजूदा घटनाक्रम में भले ही अशोक गहलोत विजेता बन के उभरे हो। मगर कांग्रेस को इसका खामियाजा आने वाले दिनों में उठाना पड़ सकता है। सचिन पायलट के कांग्रेस छोड़ने से राजस्थान में प्रभावशाली गुर्जर जाति के मतदाता भी भविष्य में कांग्रेस से दूर होंगे। सचिन पायलट युवा हैं तथा उनके पास राजनीति करने को बहुत समय है। यह कांग्रेस के लिए अच्छी खबर नहीं है। कांग्रेस में सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अशोक तंवर जैसे नेताओं को पार्टी छोड़ने से नहीं रोका गया तो दिन प्रतिदिन जनाधार खोती जा रही कांग्रेस को बचा पाना मुश्किल ही नहीं असंभव होगा।


जादूगर से उलझ बैठे सचिन पायलट

  • अपनी सूझबझ से बड़े-बड़े धुरंधरों को पटखनी देने वाले सियासी जादूगर हैं गहलोत
  •  हर सचिन खिलाड़ी नहीं होता औऱ हर पायलट उड़ान नहीं भर सकता

राजनीति के गलियारे सें सियासी उठापटक होना कोई नई बात नहीं है।लेकिन राजस्थान के राजनैतिक गलियारे में दो छत्रपों के बीच पिछले कुछ महीनों से जो महासंग्राम चल रहा है वह अपने तरह का एक असाधारण परिघटना भी नहीं है । और ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है। बीते सत्तर सालों के इतिहास में कई बार जोड़-तोड़ के राजनैतिक समीकरण बनाने में सिपहसलारों ने अपनी कुशलता का परिचय दिया और अपने सियासी परचम को बुलंद किया ।पायलट और गहलोत की राजनैतिक लड़ाई भी इससे अलग नहीं है ।दोनों राजनीति के धुरंधर हैं ।यह दो पीढ़ियों के बीच की लड़ाई भी नहीं है । यह महत्वकांक्षा और अति महत्वकांक्षा के बीच का द्वंद है। गहलोत राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं । उनको जानने वाले उन्हें जादूगर कहते हैं। वह सर्कस , मेले या गांव- शहर के किसी चौराहे पर अपनी कलात्मकता से दर्शकों को चौंधिआने वाले जादूगर नहीं हैं । बल्कि सियासत में नाजूक मौके पर अपनी सूझबझ से बड़े-बड़े धुरंधरों को पटखनी देने वाले सियासी जादूगर हैं ।

गहलोत ने एक समय  कहा था कि हर गलती की एक कीमत होती है । गहलोत का नाम उन नेताओं में शामिल है जो अपने विरोधियों की गलतियों को आसानी से भूलते नहीं है । इसके बदले में पूरी कीमत वसूलते हैं। सीपी जोशी और मदेरणा वाले प्रकरण को कौन भूल सकता है । इनको गहलोत ने बड़े जतन से अपने सियासी राजपथ से किनारा किया ।
अभी ताजा उदाहरण ही लीजिए पायलट प्रकरण पर उनका एक बयान आया था-जब उन्होंने जयपुर में पायलट को खूब खड़ी-खोटी सुनाया । पायलट को निकम्मा और नकारा तक कहा । उन्हें काम नहीं करने वाला नेता बताया । गहलोत ने यहां कहा कि मैं बैंगन बेचने नहीं आया हूं । कोई सब्जी बेचने नहीं आया हूं । मैं मुख्यमंत्री बन करके आया हूं । गहलोत के मजबूत आत्मविश्बास को झलकाने वाले इन बयानों को हल्के में लेने की भूल किसी को नहीं करनी चाहिए । ऐसे बयान किसी भी पाशा को पलटने के लिए काफी हैं। इस बयान के पीछे इनके राजनैतिक सूझबूझ की झलक दिख रही है ।उनका मजबूत आत्मविश्वाश झलक रहा है । गहलोत आसानी से हार मानने वाले नेता नहीं है । शांत समुंद्र अपने साथ बड़ी तबाही लेकर आता है ।
वहीं दूसरी तरफ, पायलट राजनीति के उभरते हुए खिलाड़ी हैं । केन्द्र और संगठन के कई पदों को सुशोभित कर चूके हैं । उन्होंने इस बार राजस्थान में कांग्रेस सरकार की वापसी कराने में अग्रणी भूमिका  निभाई है ।लेकिन राजस्थान में उनका सियासी विमान उड़ान नहीं भर सका ।गहलोत की जादूगरी पायलट की कुशलता पर भारी पड़ी । 200 सीटों वाले राजस्थान केो सियासी विमान को युवाजोश के साथ उड़ान नहीं भर सके तो विमान हाईजैक करने की पटकथा ही लिख डाली ।अब देखना यह  दिलचस्प होगा कि पायलट अपनी पटकथा पूरी कर पाते हैं या गहलोत उनके अरमानों पर पानी फेर देते हैं ।अगर पायलट उड़ान भरने में असफल रहे तो  यह हास्यास्पद विषय नहीं होगा । चूंकि  ये सिर्फ नाम वाले पायलट हैं और क्रिकेट के मैदान पर विपक्षी गेंदबाजों की बखियां उधेरने वाले सचिन भी नहीं हैं । ये तो दो तव्वों के संयोग से बनने वाले एक मिश्रण हैं । राजस्थान वर्षों से महत्वकाक्षांओं की पीच तैयार करने वाला सियासी अखाड़ा रहा है । कालांतर में इस लड़ाई के परिणामों का मुल्यांकन किया जाएगा । 
 

Tuesday, July 21, 2020

काला धान की खेती करके अपनी आमदनी दोगुनी कर सकते हैं किसान

किसान भाई औषधीय गुणवाले काला धान की खेती करके आर्थिक रूप से सबल बन सकते हैें। काला धान  गुणकारी होने के साथ बहुत लाभप्रद भी है । काले धान की खेती से अच्छी कमाई की जा सकती है । किसानों के बीच इसकी लोकप्रियता को देखते हुए कई राज्यों की सरकार इसकी खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रही है ।

क्या है काला धान

सामान्यतौर पर आम चावल की तरह ही काला चावल होता है लेकिन इसका रंग काला होता है । विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका चावल कैंसर व मधुमेह से पीडितों  के लिए बहुत ही लाभप्रद है । उनका मानना है कि यह चावल चर्बी कम करने के साथ पाचन शक्ति बढाने में भी बहुत लाभकारी है । इसकी खेती चीन में बड़े पैमाले पर की जाती है जबकि भारत में इसकी खेती पूवोत्तर के राज्य मणिपुर और असम में की जाती है । अब भारत के कई  राज्यों में काले धान की खेती होने लगी है। धीरे- धीरे काले धान की खेती भारत में बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

पारंपरिक से कुछ अधिक होती है पौधे की लंबाई

काले धान के  पौधे की लंबाई कुछ अधिक होती है। पारंपरिक धान के पौध की लंबाई साढ़े तीन  से चार पुट होती है जबकि काले धान के पौध की लंबाई चार फुट से साढ़े चार फुट तक होती है  । इस धान के खेती के लिए अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होता है ।यह कम पानी में भी आसानी से हो जाता है ।साथ ही तैयार होने में भी अधिक समय नहीं लगता है । अमूमन यह 120 दिनों में तैयार हो जाता है ।

सेहत और कमाई दोनों साथ- साथ

पारंपरिक धान के मुकाबले इससे अधिक कमाई होती है। कई राज्यों की सरकार इसकी खेती  के लिए किसानों को प्रोत्साहित भी कर रही है । जैविक तरीके से इसकी खेती की जाए तो किसानों को मोटी कमाई होती है । पांरपरिक चावल 20 से 80 रूपये तक बिकते हैं वहीं इसके चावल की कीमत 250 रुपये तक होती है । साथ ही जैविक तरीके से ऊपजाएं गए काले धान के चावल की कीमत 500 रुपये तक होती है ।

विटामिन व एंटी ऑक्सीडेंट का खजाना

काले धान के चावल में विटामिन बी, ई के साथ कैल्शियम , मैग्नीशियम , आयरन तथा जिंक आदि प्रचुर मात्रा में  मिलते हैॆ । ये सारे हमारे शरीर में एंटी ऑक्सीडे़ट का काम करते हैं । इसके सेवन से खून भी साफ होता है ।
इसके खेती में  रासायनिक खाद का प्रयोग न होने से इस धान के चावल में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है ।

ऑनलाइन बीज है उपलब्ध

कई  ई कॉमर्स कंपनियां बीज उपलब्ध करा रही हैं । भारत में काले धान की खेती सर्वप्रथम मणिपुर में शुरू हुई । पूवोत्तर राज्यों के किसान से  ई-कॉमर्स वाली कंपनियां बीज खरीद कर अपने माध्यम से बेच रही है ।

Monday, July 20, 2020

आदमी घर क्यों बसाता है... सिर्फ अपने अधूरेपन को दूर करने के लिए ।

प्रत्येक इंसान की चाहत होती है कि उसका एक साथी हो ...जिसके साथ वह अपने अधूरेपन को बांट सके... इंसान कैसा भी हो उसके अंदर एक साथी की चाहत होती है...
 एक ऐसा साथी जिसके साथ वह अपनी वेदनाओं को ...अपनी संवेदनाएं को बांट सके और खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें... इसके लिए जरूरी होता है कि घर बसाया जाए... फिर भी एक शांतचित्त जीत वाले व्यक्ति के मन में यह सवाल उठते रहता है ...कि एक आदमी घर क्यों बताता है... वह किसी के साथ विवाह के बंधन में क्यों बंधना चाहता है... सिर्फ इसलिए क्योंकि वह अपने को अधूरा समझता है... इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए वह वैवाहिक संबंध में बंधता है...आखिर ऐसा क्या है कि हर व्यक्ति अपने जीवन में एक अधूरापन अनुभव करता है... एक प्रकार का खालीपन महसूस करता है ...और उस अधूरेपन को पूर्ण करने के लिए... उसे भरने के लिए... उसे एक साथी की आवश्यकता पड़ती है... अपने जीवन की इस  अपूर्णता और अपने अधूरेपन की पूर्णता में बदलने के लिए...उसे विवाह की आवश्यकता होती है... लेकिन जहां तक इस विषय के बारे में विचार है ...प्राकृतिक संरचनाओं निर्बाध रूप से चलते रहे इसके लिए विवाह आवश्यक है.... लेकिन इसे अनिवार्य नहीं बनाना चाहिए... इसे प्रत्येक व्यक्ति के अपने व्यक्तिगत निर्णय पर छोड़ देना चाहिए.... ,हालांकि यह प्रामाणिक विषय है कि विवाह किसी दूसरे के अधूरेपन को पूर्ण करना नहीं अपितु अपने अधूरेपन को दूर करना है।

जोरम मेगा फूड पार्क 5000 लोगों को रोजगार देगा : हरसिमरत कौर बादल

केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री श्रीमती हरसिमरत कौर बादल ने कहा कि कि जोरम मेगा फूड पार्क हजारों लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार देगा । ये बातें श्रीमती बादल ने मिजोरम में स्थित जोरम मेगा फूड पार्क के वर्चुअल उद्घाटन समारोह को संबोधित करते कही।
केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री ने कहा कि यह मिजोरम राज्य में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के विकास में काफी मददगार साबित होगा। खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के विकास को नई गति देने के उद्देश्य से मिजोरम राज्य में मेगा फूड पार्क को मंजूरी दी है।यह मिजोरम राज्य में संचालित पहला मेगा फूड पार्क है।श्रीमती बादल ने कहा कि अब तक पूर्वोत्तर क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय से सहायता प्राप्त कुल 88 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है और 41 परियोजनाएं कार्यान्वित की जा चुकी हें। श्रीमती बादल ने कहा कि सरकार भारत में अपना उद्यम शुरू करने के इच्छुक निवेशकों के लिए सहज, पारदर्शी एवं आसान माहौल प्रदान करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। सरकार ने खाद्य प्रसंस्करण को ‘मेक इन इंडिया’ का एक प्रमुख क्षेत्र बनाया है। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी के मार्गदर्शन में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है । और यह किसान की आय दोगुनी करने एवं सरकार की पहल ‘मेक इन इंडिया’ में
योगदान दे सके।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पूवोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय इस बात से खुश है कि अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त यह एमएफपी मिजोरम में खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देगा।खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री श्री रामेश्वर तेली ने कहा कि जोरम एमएफपी में दी जा रही सुविधाओं से न केवल खाद्य पदार्थों की बर्बादी में कमी आएगी। उन्होंने कहा कि यह पार्क किसानों की आय बढ़ाने और कृषि उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करने में मदद करेगा।इस मेगा फूड पार्क से कोलासिब जिले के लोगों के साथ-साथ मामित एवं आइजॉल और असम के हैलाकांडी, कछार जिले के लोगों को भी फायदा होगा।

Sunday, July 19, 2020

5 अगस्त को राम मंदिर के निर्माण के लिए भूमिपूजन संभावित

अयोध्या में प्रस्तावित राम मंदिर का मॉडल तैयार हो गया है। प्रस्तावित राम मंदिर 161 फीट ऊंचा बनाया जाएगा। शनिवार को राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट की बैठक हुई ।पीएमओ को  प्रधानमंत्री को अयोध्या आने का निमंत्रण पत्र भेज चुके हैं। 5 अगस्त को अयोध्या राम मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन  होगा। मीडिया में चल रही खबरों के मुताबिक, पीएमओ ने 5 अगस्त को चुना है।कयास लगाए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस भूमि पूजन में शामिल हो सकते हैं। अयोध्या में 161 फीट ऊंचा राम मंदिर बनाया जाएगा।

प्रस्तावित राम मंदिर का निर्माण साढ़े तीन साल में पूरा होगा

इस मौके पर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने  कहा कि   मानसून के बाद स्थितियां सामान्य हो जाएंगी, तब लोगों से वित्तीय सहायता के लिए संपर्क किया। उन्होंने कहा कि  मंदिर निर्माण से संबंधित सभी ड्राइंग पूरी होने के बाद  मंदिर निर्माण तीन से साढ़े तीन साल में पूरा हो जाएगा। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने कहा कि धीरे-धीरे मलबे को हटा दिया गया है और श्रमिक को उस जगह पर ले जाना आसान बना दिया गया है जहां मंदिर प्राप्त किया जाता है। गहरी खुदाई करके जमीन का परीक्षण किया जा रहा है। अगर जमीन सही नहीं निकली तो मंदिर को और आगे बढ़ाया जा सकता है। चंपत राय ने कहा कि मंदिर के निर्माण के लिए 100 मिलियन लोगों का सहयोग लिया जाएगा।

शिक्षा सबको मिलनी चाहिएऔर बराबर मिलनी चाहिए साहब...Everyone should get education and should get equal sir

शिक्षा सबको मिलनी चाहिएऔर बराबर मिलनी चाहिए साहब...इसके अभाव में इंसान को जीवन बड़ा कठिन होता है।हमारा समाज जो लोग पढ़े लिखे नहीं होते हैं  उसे बहुत उपेक्षित भाव से देखता है।निरादर करता है ।उनके विचारों को गंभीरता से नहीं लेता है। लेकिन इतिहास साक्षी है कम पढ़े लिखे लोगों ने अपने जीवन में बहुत सारे असाधारण काम  किए है, जिसका लाभ सदियों तक आमजन उठाते रहे हैं । इसके बारे में एक बार स्वामी विवेकानंद ने कहा था  कि हमारे देश के सभी अनर्थों की जड़ में गरीबी है । हमारे देश के जो गरीबजन है उनको शिक्षित करना हमारा ,उन्हें  सिखाना कि इस संसार में तुम भी एक मनुष्य हो ...तुम सब भी प्रयास करके विकास कर सकते हो...अभी वे लोग जो भाव तो खो बैठे हैं...


हर किसी में एक नायक छुपा हुआ होता है । उसे बताना कि आकाश में उड़ती चिड़ियों के आनंद को समझना ।उसे बताना कि कड़ी धूप में भी सहज की खोज में कैसे निकलती हैं । मधुमक्खियां और पहाड़ की हरी-भरी तलहटी में खिलने वाले फूलों के होते हैं । पढ़ाई के बारे में समझाना की नकल करके पास होने के बजाय लाख गुना बेहतर है परीक्षा में फेल हो जाना । भले ही कोई आपको गलत ठहराए है । उसे सिखाना अपने विचारों पर भरोसा करना । साथ ही यह भी सिखाना कि वह अपने दिल और दिमाग पर कोई प्राइस टैग ना करें । उसे सिखाना कि किसी जबरदस्त भीड़ के सामने कैसे सिखा जाता है ।अगर लगेगी वह सही है तो कैसे अपने सच के लिए लिए लड़ा जाता है । उसे जरा प्यार से समझाएं जो अभी तक अपनी बातों को नहीं समझ पाए हैं । हर किसी को अपनी छाती से लगाना चाहिए क्योंकि मैं जानता हूं कि आग में तप कर ही सोना कुंदन बनता है ।


Everyone should get education and should get equal sir

Education should be given to everyone and should be equal, sir ... In the absence of this, life is very difficult for a human being. Our society looks at the people who are not educated and neglected. is. But history is witnessing that the less educated people have done a lot of extraordinary work in their lives, whose benefits have been enjoyed by the masses for centuries.
Swami Vivekananda once said about this that poverty is at the root of all the sins of our country. It is ours to educate the poor people of our country, to teach them that you are also a human being in this world… You all can also develop by trying… Now those people who have lost their sense…
Everyone has a hero hidden in them. Tell him how to understand the joy of birds flying in the sky. Tell him how to get out in search of spontaneous even in hard sunlight. Bees and flowers bloom in the lush green foothills of the mountain. It is a million times better to fail in the examination than to pass by explaining the explanation about studies. Even if someone justifies you wrong. Teach him to trust his thoughts. Also, teach him not to put any price tag on his heart and mind. Teach him how to teach in front of a huge crowd. If he feels right then how to fight for his truth. Explain it with love to those who have not yet understood their words. Everyone should wear it with their chest because I know that gold becomes kundan only by doing tenacity in a fire.

Saturday, July 18, 2020

समानता के लिए सघंर्ष करता दिव्यांग समाज....

दिव्यांग शब्द सुनते ही हर किसी के मन में दया का भाव पैदा होता है।बड़ी तत्परता से लोग सहानुभूति दिखाने को आतुर हो जाते हैं।लेकिन वहीं लोग जब बात समानुभूति की आती है तो कोसो दूर पीछे चले जाते है।
जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने रेडियों संबोधन कार्यक्रम मन की बात में कहा था कि शारीरिक रूप से अशक्त लोगों के लिए विकलांग शब्द की जगह दिव्यांग शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए । उसके बाद विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द का प्रयोग होने लगा।
प्रधानमंत्रीजी के ऐसा कहने के बाद लगा था कि अब स्थिति में सुधार होगा, लेकिन दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रमों और उसके मदों में कोई इजाफा नहीं किया गया।
2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में 2.68 करोड़ दिव्यांगजन हैं।अन्य जानकारियों के अनुसार यह आँकड़ा कुल जनसंख्या का पांच प्रतिशत हो सकता है।वैश्विकस्तर पर यह आंकड़ा इसके उलट है।ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में तो यह आंकड़ा उनकी कुल आबादी का नौ से बारह प्रतिशत तक है।
दिव्यांगजनों के लिए पहली बार आजादी के बाद 1995 में एक कानून लाया गया,जिसे निशक्तजन अधिनियम 1995 के नाम से जाना गया।इसके बाद दिव्यांगजनों की स्थिति में थोड़ी सुधार हुई।उस समय सार्वजनिक सेवाओं और कार्यक्रमों में 3 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था।लेकिन केन्द्र की मोदी सरकार ने दिव्यांगजनों को दी जाने वाली आरक्षण की श्रेणी को तीन से बढ़ा कर चार कर दिया। इसके साथ ही विकलांगता की श्रेणी को सात से बढ़ा कर इक्कीस कर दिया।
गौरतलब हो कि सभी सार्वजनिक सेवाओं में वर्षों से दिव्यांगजनों के कई हजार पद खाली है,जिन्हें भरने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया ।

दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण के लिए बड़े जोर-शोर से सुगम्य भारत अभियान चलाया गया।इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य दिव्यांगजनों के लिए सक्षम और बाधारहित वातावरण उपलब्ध कराना था।लेकिन इस दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं होना चिंता का विषय है।
इतने समय बीत जानें के बावजूद अधिकांश सार्वजनिक एवं निजी कार्यलय दिव्यांगजनों के अनुकूल नहीं बन पाया है।जे इस बात का सूचक है कि विकलांग को दिव्यांग बना दिया गया ।लेकिन उनके प्रति रैवया अभी भी भेदभाव पूर्ण है।
दिव्यांगजनों के सशक्तिकरण के लिए एनएसडीसी के सहयोग से एक राष्ट्रीय कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।इस कार्य योजना का मुख्य उद्देशय 2022 तक 25 लाख लोगों को प्रशिक्षित करना है।दिव्यांगजनों के लिए चलाई जाने वाली अधिकांश योजनाओं की स्थिति अत्यंत चिंता का विषय है।इस योजना के क्रियान्वित करने वाली संस्थाओं के लिए यह लूट का जरिया है।
देश दुनियां में ऐसे कई लोग हुए हैं जिन्होंने अपनी शारीरिक कमियों को उन्होंने अपनी ताकत बनाया।उन्होंने जीवन में असाधारण सफलता को प्राप्त किये।यह इस बात का प्रतीक है कि जब भी दिव्यांगजनों को मौका मिला है,उन्होंने उसे भुनाने में कोई कसरह नहीं छोड़ा।

झांसी की रानी की समाधि स्थल......एक यात्रा

पिछले दिनों मैं ग्वालियर गया था । जिस टीम के साथ इस पांच दिवसीय यात्रा पर गया था, उसमें मेरे साथ तीन और बेहद खास लोग शामिल थे ।
काफी व्यस्त कार्यक्रमों के बीच मैंने ग्वालियर शहर की भव्यता ऐतिहासिकता और प्राचीनता से रूबरू होने का निश्चय किया। इसके लिये मैंने शहर के ऐतिहासिक स्थलों व इमारतों की एक सूची तैयार कर उसे क्रमबद्ध करने की योजना पर अमल किया।
वैसे तो ग्वालियर शहर का नाम सुनते ही मन रोमांच से भर जाता है। भला ऐसा क्यूं न हो । इस शहर का स्थान भारत के चुनिंदा ऐतिहासिक शहरों में जो शामिल है। यह शहर भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास को स्वयं में समेटे हुए है । मैंने कुछ स्थलों को अपने सूची में प्राथमिकता दिया , जिनमें ग्वालियर किला, मनमंदिर महल ,जयविलास भवन ,सास बहू मंदिर, तेली का मंदिर, जौहर कुंड, गुरुद्वारा दाता बंदी साहिब ,तानसेन का मकबरा और झांसी की रानी का समाधि स्थल मुख्य थे ।
ग्वालियर किला देखने के साथ ही मैंने सूचीबद्ध किये गए सारे स्थलों को एक के बाद एक क्रमबद्ध तरीके से देखा ।शाम ढलने वाली थी। मैं अपनी टीम के साथ ग्वालियर से वापस लौट रहा था, लेकिन मेरा मन कचोट रहा था।
हम लोगों को वापस पटना भी लौटना था । झांसी की रानी के समाधि स्थल नहीं जाने के कारण मन विचलित था ।लेकिन शायद किस्मत में रानी के समाधि स्थल पर जाना लिखा था ।देखिए ! किस्मत कनेक्शन के साथ संयोग भी गजब का बैठा । स्टेशन वापसी के क्रम में जो रास्ता चुना, उसी रास्ते पर तानसेन का मकबरा और झांसी की रानी की समाधि स्थल दोनों था।
मुझे अचानक से बने इस संयोग पर एक पल के लिए यकीन नहीं हुआ। लेकिन यह संयोग वास्तविकता में आकार ले चुका था। मेरे सामने रानी के समाधि स्थल का मुख्य द्वार था। मेरी नजर सबसे पहले मध्य प्रदेश सरकार के उस बोर्ड पर जाकर टिकी , जिस पर मोटे मोटे अक्षरों में लिखा था राज्य संरक्षित स्मारक महारानी लक्ष्मी बाई ग्वालियर।
मुझे ऐतिहासिक स्थलों पर जाना और उनसे रूबरू होना हमेशा से अच्छा लगता रहा है। ग्वालियर शहर का अपना इतिहास समृद्ध है। शहरवासियों ने अपने इस विरासत को बड़े जतन के साथ संभाल कर रखा है । घूमने के लिए मैं जहां भी गया वहां साफ-सफाई व सुरक्षा व्यवस्था उच्च कोटि का दिखा। रानी लक्ष्मीबाई के समाधि स्थल का परिसर एक बड़े भूभाग में फैला हुआ है।परिसर पूरी तरह से हरा भरा है । चहारदीवारी के साथ सुरक्षा प्रभारी व कृत्रिम प्रकाश की व्यवस्था उच्च कोटि की ।

ग्वालियर किला से स्टेशन हमलोग ऑटो से वापस आ रहे थे ।ऑटो वाले भैया बहुत ही भद्रजन निकले । रास्ते में उन्होंने ग्वालियर राजघराने, झांसी की रानी के बारे में बताने के साथ ही प्रदेश की मौजूदा सरकार के बारे में भी अपने नपे तुले शब्दों में बता रहे थे।
सिंधिया राजघराना उस समय का सबसे समृद्ध और शक्तिशाली राजघरानों में से एक था । झांसी की कमान लक्ष्मीबाई के हाथ से निकल जाने के बाद उन्होंने गोरों के खिलाफ आजादी के अपने बिगुल को शांत नहीं होने दिया । झांसी की रानी ने तात्या टोपे को साथ लेकर फिर से एक सैन्य टुकड़ी का गठन किया । इस सैन्य टुकड़ी में लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों को भी अपने साथ मिलाया ।उन्होंने बड़ी आसानी से ग्वालियर किला को अपने कब्जे में ले लिया।
गोरों के साथ लड़ाई में रानी लक्ष्मीबाई का साथ वहां के स्थानीय साधू सन्यासियों ने भी दिया ।आज भी वहां सारे साक्ष्य मौजूद हैं जो रानी के संघर्ष की कहानी बयां करते हैं । वहां उन साधुओं की भी समाधि स्थल है जो 1857 के समय में रानी का साथ दिये थे। साधु गंगादास ने झांसी की रानी का अंतिम संस्कार अपनी कुटिया में आग लगाकर किया ।
झांसी की रानी की समाधि स्थल शहर के बीचों बीच मुख्य मार्ग पर है। गेट से अंदर हमलोग दाखिल हुए तो सामने एक विशालकाय घोड़े पर बैठे रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा दिखा।और उसके सामने उनकी समाधिस्थल । इन दोनों के बीच जलती हुई शहीद ज्योति है। जो हमेशा जलती रहती है। और हमें रानी के सर्वोच्च बयान बलिदान को स्मरण कराती है ।
अंत में मैं यही कहूंगा कि अगर आपको कभी भी ग्वालियर जाने का मौका मिले तो झांसी की रानी के समाधि स्थल पर जरूर जाएं
        मान सिंह का किला ( avinash )

राजपथ दिखेगा स्‍टार्टअप का आइडिया.....

उद्योग एवं आंतरिक व्‍यापार संवर्धन विभाग इस साल नई दिल्‍ली के राजपथ पर गणतंत्र दिवस परेड के मौके पर स्‍टार्टअप इंडिया पर एक झांकी प्रदर्शित करेगा। झांकी का थीम स्‍टार्टअप्‍स: आसमान तक पहुंच विषय है।
इस झांकी में स्‍टार्टअप के विभिन्‍न आयामों और सरकार द्वारा मिली रही तमाम सुविधाओं को दर्शाया जाएगा। साथ ही इस झांकी में यह दिखाया जाएगा कि स्‍टार्टअप का आइडिया कैसे अस्तित्‍व में आया।और नवाचारों ने भारत के लोगों के जीवन को कैसे प्रभावित किया।
झांकी में सबसे आगे एक सृजनात्‍मक दिमाग दर्शाया जाएगा, जो दुनिया की वास्‍तविक समस्‍याओं का समाधान निकालने के लिए नये विचारों से पूर्ण होगा।इसके बाद झांकी के मध्‍य में स्‍टार्टअप इंडिया ट्री होगा, जो स्‍टार्टअप को मिल रही विभिन्‍न सुविधाओं को दर्शाएगा। झांकी के पिछले हिस्‍से में दिखाया जाएगा कि इसने किस तरह आर्थिक वृद्धि को गति दिया और इससे बड़े स्‍तर पर रोजगार के अवसर सृजित किए।
दरअसल ,स्‍टार्टअप इंडिया भारत सरकार की एक महत्‍वपूर्ण पहल है, इसका मुख्य उद्देश्यसतत आर्थिक विकास को गति देना और बड़े स्‍तर पर रोजगार के अवसरों का सृजन करना है।
16 जनवरी, 2016 को शुरू की गई स्‍टार्टअप इंडिया में 28 राज्‍यों एवं 7 केन्‍द्र शासित प्रदेशों के 551 जिलों में 26,000 से अधिक स्‍टार्टअप कंपनियां हैं।

फिटनेस को बढ़ाव देने के लिये रेलवे की अनोखी पहल.....

अपनी फिटनेस दिखाइए और बदले में प्लेटफार्म टिकट निशुल्क पाइए। रेलवे ने दिल्ली के आनंद विहार स्टेशन पर लोगों को फिटनेस के प्रति जागरूक करने के लिए एक Squat Machine लगाई गई है। इस मशीन के सामने निर्धारित एक्सरसाइज करने से निशुल्क प्लेटफार्म टिकट दिया जाता है। 
आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर फिटनेस को प्रोत्साहित करने के लिए यह अनूठा प्रयोग किया गया है।रेल यात्रियों के बीच उठक बैठक कर निशुल्क प्लेटफार्म टिकट देने की पहल कौतूहल का विषय बना हुआ है।कई लोग रेलवे की इस पहल की सराहना भी कर रहे हैं।
खेल मंत्री किरण रिजिजू ने अपने ट्वीट में इसे रेलवे का एक अनोखा तथा गजब का प्रयोग बताया है। और कहा है कि इससे स्वास्थ्य के साथ बचत भी होगा। उन्होंने आम जनता से प्रधानमंत्री के फिट इंडिया मूवमेंट से जुड़ने के लिये  अपील की।
एक दूसरे ट्वीट में दादी प्रकाशी तोमर ने कहा कि यह सही है भाई प्लेटफार्म टिकट भी एक्सरसाइज करके फ्री में ले लो और चलते फिरते सेहत भी बनाओ ट्रेन भी पकड़ो। उन्होंने इस पहल के लिये रेलमंत्री पीयूष गोयल की सराहना  की।
महिला पहलवान गीता फोगाट ने भी ट्वीट कर इसे रेलवे की अच्छी शुरुआत कहा। उन्होंने आगे कहा कि इससे फिट इंडिया मूवमेंट को गति मिलेगी। यह एक अच्छी शुरूआत है।इस सेवा का लाभ उठाने के लिए 3 मिनट में तीस उठक बैठक करना होगा। यात्रियों को  स्वास्थ के प्रति जागरूकता बढ़ाने के  लिहाज़ से भारतीय रेल ने इसकी शुरूआत आनंद विहार रेलवे स्टेशन से की है।
गौरतलब हो कि आनंद विहार रेलवे स्टेशन को एयरपोर्ट की तरह विकसित किया जा रहा है। इस कारण यात्रियों के लिए कई तरह की सुविधाओं को आनंद विहार स्टेशन पर मुहैया कराया जा रहा है।उसी दिशा में उठाया गया यह एक कदम है ।

कोरोना से लड़ाई में सभी हैं सुपर हीरो

दिखिये परिस्थितियों की गम्भीरता को समझने की कोशिश कीजिए। हम आभासी दुनिया में नहीं जी रहे हैं।हमारा सामना वास्तविकता से हो रहा है।यह हॉलीवुड के किसी फ़िल्म की पटकथा भी नहीं , जिसमें कोई सुपर हीरो होगा और वो हमारी रक्षा कवच बनेगा ।वास्तविकता यह है कि आज हमें अपनी रक्षा खुद ही करनी होगी ।इस महायुद्ध में सबकी सहभागिता जरूरी है।कोई भी अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता।आज राजा और प्रजा सब एक हैं।हमें आज खुद को बचाना है।अपने परिवार को बचाना है।देश को बचाना है।मानवता को बचाना है। ।कोई सुपर हीरो नहीं आने वाला है। हम अपने लिए खुद ही सुपर हीरो हैं।
इस विकट परिस्थिति में पीएम बार बार राष्ट्र को संबोधित कर रहे हैं ,और देश को कोरोना वायरस की भयावहता से आगाह कर रहे हैं ।अगर पीएम की नहीं तो दुनियाभर में कोरोना वायरस से लड़ रहे कर्मवीरों के वीडियो को देखिए।फिर आप कोरोना वायरस से होने वाली तबाही को समझिए। पीएम के लफ्जो की मार्मिकता को समझिए। ये किसी पिकनिक का टाइम नहीं है । खुद को बचाने की लड़ाई है।इस महामारी ने समूचे विश्व को अपने चपेट में ले लिया है।चाहकर भी कोई व्यक्ति या राष्ट्र किसी की मदद नहीं कर पा रहा।इतनी भारी तबाही पिछले दो विश्व युद्धों में भी नहीं हुई थी। उस समय भी ट्रेन, हवाई सेवाएँ कभी बाधित नहीं हुई थी। लोग अपने घरों में कैद नहीं हुए थे। लेकिन आज पूरी गतिविधियां ठप करने की आवश्यकता है। खुद को बचाकर मानवता को बचाने की चुनौती है। मौजूदा समय में अपने राष्ट्र का सहयोग करने की जरूरत है।

पूरी दुनिया कोरोना से है त्रस्त

कोरोना से पूरी दुनिया त्रस्त है।किसी को पता नहीं कि यह वायरस कब जाएगा, लेकिन इतना पता है कि जब भी जाएगा अपने पीछे भारी तबाही छोड़कर जाएगा।इसके बाद देशों के बीच के सम्बंध को फिर से परिभाषित किया जा सकता है। ज्यादातर दलों के नेता के नेता इस मुद्दे पर भी मोदी को घेरने में लगे हुए हैं। उसने अपना हिसाब चुकता करने में लगे हुए हैं।उन्हें यह संकट अपनी राजनीति चमकाने का मौका नजर आ रहा है। वे संकट का मुकाबला करने में एकजुटता दिखाने , सुझाव देने और मदद का हाथ बढ़ाने के बजाय बाल की खाल निकालने में लगे हुए हैं।
अमेरिका , इजरायल समेत कई देश और वैश्विक संस्था मोदी के कोरोना से निपटने की भारत की तैयारियों की प्रशंसा कर रहे हैं।नफरत की राजनीति का सिलसिला संकट के समय भी नहीं रुक रहा। राष्ट्रीय संकट के समय लोग अपने मदभेद भुलाकर साथ खड़े होते हैं, मोदी विरोध के नाम पर राष्ट्र विरोधी विचारों से ऐसे लोग ग्रस्त दिख रहे हैं।
आज हमें सीमाओं में बंधकर सीमाओं को तोड़ने की आवश्यकता है। आलोचनाओं से इतर समालोचना करने की जरूरत है। परिस्थितियों की गम्भीरता को समझते हुए वैचारिक कटुताओं को भुला कर इतिहास रचने की जरूत है।एक कालजयी इतिहास रचने का मौका हमारे पास है ।आने वाली पीढ़ियों को जिसके पर गर्व हो। आइए मिल बैठ कर स्वयं को कैद करते हैं। मानवता को बचाते हैं।अपने घर में रहते हैं...
राहत इंदौरी साहब लिखते हैं...
मेरे ख़याल, मेरे ही दिल, मेरी नज़र में रहो,
ये सब तुम्हारे ही घर हैं, किसी भी घर में रहो।

कोरोना से लड़ाई में एक जाट की व्यथा

जाटों के बारे में एक कहावत प्रचलित है... जाट पहले कोई काम  करते हैं फिर उसके परिणामों के बारे में सोचते हैं...
ऐसा ही एक जाट मेरा मित्र है...वह किसी भी काम को करने के बाद ही उसके परिणाम के बारे में सोचता है..... लेकिन आज उसने सुबह सुबह ही मुझे फोन किया....और फोन पर ही तमतमाते हुए वह बोला ....हद हो गई मिश्रा जी ...इंसानियत का जमाना ही नहीं रहा...स्वार्थों से सभी घिरे हुए हैं... आज परिस्थिति करे कोई और भरे कोई वाली आ गई है.... उसके विचारों में उग्रता और विषय की गम्भीरता को समझते हुए मैंने बोला...तुम्हारे जीवन में ऐसा क्या भूचाल आ गया भाई...आज इतना क्यूं भड़क रहे हो...आखिर ऐसा क्या हो गया कि आज मेरा जाट कोई काम करने से पहले ही परिणाम के बारे  में सोच कर परेशान लग रहा है...
इसके बाद उसने चिंतित भाव से बोला ....देखो मिश्रा जी...इससे अच्छा तो HIV था...जो करता था...वही भरता था...ये कोरोना तो सबको रुला रहा है...
फिर मैंने उसे कहा कि...तुम्हारी बात तो सौ फीसद सच है... लेकिन कोरोना तो समाजवादी निकला साहब...अमीर-गरीब सबको बराबर मिल रहा है... इसके लिए कोई धरना -प्रदर्शन भी नहीं कर रहा...आरक्षण की मांग तो कोसों दूर की बात है... मिल सबको रहा है... लेकिन इसे लेने के लिए कोई तैयार नहीं... सब इससे दूर भाग रहे हैं... इतने दूर कि अपने अपने घरों में ही दुबके हुए हैं...
थोड़ा और विचारों की गहराई में जाते हुए मैंने उनसे कहा...अब देखिये न साहब....इसके जैसा समाजवादी विचारक आज से पहले न हुआ था ....और न ही आगे पैदा होने के आसार दिख रहे हैं..... ये तो राजा और प्रजा में भी अंतर नहीं कर रहा...बूढ़े और जवान को भी नहीं छोड़ रहा...ये तो इतना समाजवादी है कि... किसी जमाने में पूरी दुनिया में राज करने वाले लोग को भी वैसे ही मिला... जैसे सड़क के किनारे... अपनी भूख और प्यास मिटाने के लिए... मुसाफिरों के आगे..
. दो पैसे के लिए गिड़गिड़ाने वाले लोगों को मिल रहा है...
अब देखिये इसकी उदारता ...ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स को भी यह मिला है...अमेरिका और जर्मनी के लोगों को भी मिल रहा...
मेरे भावपूर्ण विचारों को सुनकर मेरे मित्र ...थोड़े से हल्के हुए....इसके बाद मुस्कुराते हुए बोले....लग रहा है ...ये पक्का समाजवादी है... जवानी कुर्बान करने वाला नहीं लगता....

कोरोना वायरस से उपचार और रोक थाम के लिए आवश्यक उपकरणों के खरीदने में किया जाना है इस राशि का उपयोग किया जाएगा

हाजीपुर संसदीय क्षेत्र में पाँच विधानसभा क्षेत्र है। जिनके नाम हाजीपुर, लालगंज, महनार, महुआ, राजापाकर और राघोपुर हैं। इनमें से दो विधानसभा क्षेत्र राघोपुर और महुआ के लिए बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने एक करोड़ रुपये दिए।इस राशि का उपयोग कोरोना वायरस से उपचार और रोक थाम के लिए आवश्यक उपकरणों के खरीदने में किया जाना है।इस राशि में से दोनों विधानसभा क्षेत्र में 50 -50 लाख रुपये उपयोग किया जाएगा।

आखिर राघोपुर और महुआ ही क्यूं

राबड़ी देवी बिहार की भूतपूर्व मुख्यमंत्री हैं । उन्होंने तीन बार राष्ट्रीय जनता दल के सदस्य के रूप में मुख्यमंत्री का पदभार संभाला। पहली बार राबड़ी देवी राघोपुर विधानसभा क्षेत्र से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुईं थी।इसके बाद वह बिहार की मुख्यमंत्री बनी।वर्तमान में राघोपुर और महुआ विधानसभा की दोनों सीटों पर राजद का मजबूत पकड़ है। मजबूत पकड़ इसलिये कहा जाएगा क्योंकि इन दोनों विधानसभा सभा क्षेत्र में राजद के परंपरागत वोटरों का संख्याबल अधिक है। इसी सीट से राबड़ी देवी और लालू यादव के दोनों पुत्र निर्वाचित हुए। राबड़ी देवी के बड़े पुत्र तेजप्रताप यादव महुआ से और छोटे बेटे तेजस्वी यादव राघोपुर से चुने गए। इसके तेजप्रताप यादव बिहार के स्वास्थ्य मंत्री बने। जबकि जदयू -राजद के महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बनाया।

दोनों विधानसभा क्षेत्र के लोगों को क्या मिला लाभ

स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद तेजप्रताप यादव ने अपने विधानसभा क्षेत्र के विकास के लिए कई उल्लेखनीय कार्य किए। इसमें सबसे प्रमुख कार्य क्षेत्र के लोगों की बहुप्रतीक्षित मांग मेडिकल कॉलेज खोलने की पूर्ति करना रहा ।स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद उन्होंने इस दिशा में तेजी से कदम उठाते हुए महुआ विधानसभा में मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए अग्रणीय भूमिका निभाई। अब क्षेत्र में यह मेडिकल कॉलेज अपना आकार ले रहा है।
लालू यादव के छोटे बेटे यानी तेजस्वी यादव को उनका उत्तराधिकारी कहा जाता है। लालू यादव के समर्थक उनमें बिहार के मुख्यमंत्री की झलक देखते हैं। लालू यादव की तरह ही तेजस्वी सीधे जनता से संवाद करने में माहिर खिलाड़ी हैं। अपने क्षेत्र में हरेक साल बाढ़ की विभीषिका से होने वाली तबाही से लोगों को निजात दिलाने के लिए तेजी से कार्य किये। साथ पटना के कच्ची दरगाह से वैशाली के बिदुपुर तक जाने वाली सिक्स लेन की पुल से राघोपुर को जोड़ने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है।इसलिए राजद इस दोनों विधानसभा क्षेत्र में अपनी पकड़ कमजोर नहीं होने देना चाह रहा है

और अंत में

राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री रही हैं । एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें पूरे बिहार के बारे में सोचना चाहिए था। उन्होंने ने समूचे बिहार का प्रतिनिधित्व किया था।
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नहीं रहे बॉलीवुड के मशहूर एक्टर इरफान खान

बॉलीवुड कलाकार इरफान खान का बुधवार को 54 साल की उम्र में निधन हो गया । वे मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती थे ।इरफान खान पिछले काफी समय से ट्यूमर और आंतों के इन्फेक्शन से जूझ रहे थे ।बीते दिनों उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बताया जा रहा है कि अचानक तबीयत अचानक बिगड़ गई थी जिसके बाद उन्हें आईसीयू में शिफ्ट करना पड़ा था ।
इरफान खान को 2018 में न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर होने का पता चला था ।यह एक दुर्लभ किस्म का ट्यूमर है । इसका इलाज इरफान खान लंदन में करा रहे थे।कुछ दिनों पहले ही तबीयत में सुधार होने के बाद वह लंदन से वापस भारत लौट आए थे । इरफान भारत लौटने के बाद अपना इलाज मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में करा रहे थे ।अपना रूटीन चेकअप और ट्रीटमेंट के लिए वह अक्सर कोकिलाबेन अस्पताल जाते रहते थे ।
इरफान खान ने बॉलीवुड ही नहीं हॉलीवुड तक में अपने अभिनय की छाप छोड़ी ।उन्होंने अपने अभिनय से हर वर्ग के दर्शकों को प्रभावित किया । राजस्थान के जयपुर में इरफान खान का जन्म एक मुस्लिम पठान परिवार में हुआ था ।उनके पिता टायर का व्यापार कर थे ।मुस्लिम परिवार में जन्मे इरफान बचपन से ही शाकाहारी थे ।इस वजह से उनके पिता कहा करते थे कि उनके घर ब्राह्मण पैदा हुआ है ।
बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा । भारतीय नाट्य विद्यालय के वह छात्र थे । जब उनका इसमें प्रवेश हुआ था उन्हीं दिनों उनके पिता की मृत्यु हो गई । पिता की मृत्यु के बाद उन्हें घर से पैसे मिलने बंद हो गए थे । तब प्रतिभाशाली इरफान ने फेलोशिप से मिलने वाली राशि के जरिए अपनी पढ़ाई पूरी की ।
सुतापा सिकंदर के साथ 1995 में इरफान खान ने शादी की थी । सुतापा संघर्ष के दिनों में अपने पति के साथ खड़ी रही।इरफ़ान के दो बेटे बाविल और अयान हैं।
इरफान के निधन से बॉलीवुड में शोक की लहर है।बॉलीवुड के कई दिग्गज कलाकार इरफान खान को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं ।मशहूर फ़िल्म निर्माता शुजीत सरकार ने ट्वीट कर उनके परिवार को सांत्वना दी है।
अभी दो दिन पहले ही उनकी मां का देहांत हुआ था। बताया जा रहा है कि इरफान का अपनी मां के साथ गहरा लगाव था । जिससे कई बार वह सार्वजनिक तौर पर व्यक्त भी कर चुके हैं । एक कार्यक्रम में अपनी मां को याद करते हुए उन्होंने एक शेर पढ़ा था।यह शेर उन दोनों के गहरे रिश्ते को बयां करता है ।
जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
मां दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है....

मदर्स डे 2020

माँ और बच्चे का रिश्ता इस दुनिया के सबसे मजबूत और पवित्र रिश्तों में से एक है । मां का प्यार व स्नेह अमूल्य होता है । फिर भी मदर डे के दिन कई लोग अपनी भावनाओं को जाहिर करते हैं और मदर डे को विशेष तरीके से मनाते हैं। मदर्स डे 2020 इस साल 10 मई को मनाया जाएगा । दुनिया भर में हर साल मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है । हालांकि इस तारीख के संबंध में कुछ मतभेद भी है ।कई देशों में अलग-अलग तारीख को मदर्स डे सेलिब्रेट किया जाता है ।

कैसे हुई मदर्स डे की शुरुआत

अमेरिका में सबसे पहले मदर्स डे की शुरुआत हुई थी । एना जारविस नाम की एक अमेरिकी एक्टिविस्ट अपनी मां से बहुत प्यार करती थी। इस दुनिया में मां के अलावा उनका कोई नहीं था । वह अपनी मां के साथ ही रहती थीं। उनकी देखभाल और सेवा करती थीं। अपनी मां से उनका लगाव बहुत ही गहरा था। मां से दूर होने के डर से उन्होंने शादी भी नहीं की । जब उनकी मां का देहांत हो गया उसके बाद वह बहुत अकेली हो गईं। ऐसे में अपनी मां के प्रति प्यार व लगाव जताने के लिए उन्होंने इस दिन की शुरुआत की । इसके बाद धीरे-धीरे मां के प्रति सम्मान जताने के लिए पूरी दुनिया में मदर डे मनाया जाने लगा ।
मई के दूसरे रविवार को क्यों मनाया जाता है मदर्स डे
मां के प्रति सम्मान और प्यार जताने के लिए बच्चे किसी खास दिन का इंतजार नहीं करते, फिर भी मदर डे हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मनाया जाता है । अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति विल्सन ने 9 मई 1914 को एक कानून पास किया था । इस कानून में मई महीने के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाने को कहा गया था। इसके बाद अमेरिका समेत कई देशों में मई के दूसरे रविवार को मदर डे मनाए जाने लगा । पिछले साल मदर्स डे 12 मई को मनाया गया था । लेकिन इस साल मई महीने का दूसरा रविवार 10 तारीख को पड़ रहा है। इस वजह से इस साल इसी दिन मदर्स डे मनाया जाएगा।

आप भी इस दिन को बना सकते हैं यादगार

मदर्स डे हमें अपनी भावनाओं को जाहिर करने का एक मौका देता है। इस दिन हम अपनी मां को कुछ खास उपहार दें सकते हैं ।यह खुद पर निर्भर करता है कि हम अपनी मां को क्या देना चाहते हैं ।आमतौर पर कुछ लोग मां के पसंद का उपहार देते हैं । वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं जो मां को छोटी सी ट्रिप या वेकेशन पर ले जाते हैं। लेकिन मौजूदा समय में यह संभव नहीं है। इसलिए अपने- अपने घरों में ही मदर्स डे को मनाए। जिससे कोरोना वायरस से संक्रमित होने से भी बचा जा सकता है। इसलिए बेहतर है कि हमलोग किचन के कामों में मां का साथ दें। उनका भरपूर ख्याल रखें। और सुरक्षित तरीके से इस साल मदर्स डे को मनाएं।

पटना के इतिहास का एक कोना ढह गया आज

अविनाश । पटना कालेज के ठीक सामने अशोक राजपथ पर बरगद का पेड़ आज खुद ही गिर गया...आज जब ये तश्वीर देखा तो आँखों में आसूं आ गए। बात उनदिनों की है जब में दिव्यांग होने के बाद पहली बार पटना गया था। उस समय भी आज की तरह ही पटना बहुत तेजी से भाग दौड़ रही थी।और मैं छड़ी के सहारे बड़ी मुश्किल से चलता था।कुछ किताबें खरीदने के लिए सड़क के दूसरे किनारे गया । और किताब खरीद कर वापस पटना कॉलेज कैंपस लौट रहा था। चूंकि पटना कॉलेज में ignou का मेरा स्टडी सेंटर था।दुर्भाग्य से छात्रों के हुजूम और ऑटो वाले के बीच फस गया।लगा कि अब तो बस हो गया।समझो! आज मुझे कुछ हुआ तो मेरा पढ़ाई लिखाई आज के बाद बन्द।इसके बाद कभी मेरी मां मुझे अकेले आने - जाने नहीं देती।लेकिन उस वटवृक्ष ने मेरे प्राणों की रक्षा की। मैं तेजी से उसकी तरफ भागा और किसी तरह खुद को बचा पाया। आज जब यह खबर सुनी कि अचानक से वह वटवृक्ष गया तो यह खबर सुनकर स्तब्ध रह गया.

वीर सावरकर के खिलाफ काम कर रही विचारधारा का विश्लेषण

वीर सावरकर के खिलाफ काम कर रही विचारधारा का विश्लेषण
वीर सावरकर स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिनके साथ सबसे ज्यादा अन्याय हुआ है. आज़ादी के आंदोलन से जुड़े कुछ लोगों ने भी उनका विरोध किया और सावरकर के बारे में लगातार दुष्प्रचार किया गया.
क्या जो इतिहास हम पढ़ते आ रहे हैं, उसमें मिलावट की गई है? क्या अंग्रेजों के ज़माने में भी एक टुकड़े-टुकड़े गैंग हुआ करता था, जो देश के क्रांतिकारियों में भेदभाव करता था. दरअसल, आज़ादी के लिए लड़ने वाले कुछ लोग अंग्रेजों के प्रिय क्रांतिकारी थे, जबकि कुछ से उन्हें नफरत थी. नेहरू और गांधी उनके प्रिय क्रांतिकारी थे जबकि सावकर से उन्हें घृणा थी, इसीलिए नेहरू जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को महान क्रांतिकारी बताया गया, जबकि सावरकर का सच छिपाया गया. वीर सावरकर स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिनके साथ सबसे ज्यादा अन्याय हुआ है. आज़ादी के आंदोलन से जुड़े कुछ लोगों ने भी उनका विरोध किया और सावरकर के बारे में लगातार दुष्प्रचार किया गया. ऐसा करके उन्हें इतिहास में वो स्थान नहीं दिया गया, जिसके वो हकदार थे. सावरकर ने देश की आज़ादी के लिए विदेशी ताकतों को इकट्ठा किया. उन्होंने ही देश को वर्ष 1857 में हुई स्वतंत्रता की पहली लड़ाई के बारे में बताया था और अंग्रेज उनकी गतिविधियों से इतना डरते थे कि उन्हें Dangerous Criminal यानी खतरनाक अपराधी कहते थे. लेकिन आज सावरकर को ही भारत रत्न देने की मांग पर सवाल उठाया जा रहा है.
आप सोच रहे होंगे कि ये कैसा देश है. जिसने राष्ट्रवाद के इतने बड़े नायक को ही भुला दिया. इसकी वजह है पक्षपातपूर्ण तरीके से लिखे गए इतिहास के अध्याय. जिसे दरबारी लेखकों और डिजाइनर पत्रकारों ने किसी खास सोच से प्रभावित होकर लिखा. ये इतिहास सिर्फ एक सीमित विचारधारा को ध्यान में रख कर रचा गया था और जब इतिहास के साथ खिलवाड़ करके राजनीति होती है तब सावरकर जैसे महापुरुषों के साथ अन्याय होता है. इसीलिए अब बहस हो रही है कि ऐसे इतिहास में सुधार किया जाना चाहिए. ताकि गलतियों को दूर करके उसे पूरी तरह से संतुलित बनाया जा सके और देश में हर विचारधारा से जुड़ा व्यक्ति इतिहास से अपना जुड़ाव महसूस करे.
आज हम सावरकर से जुड़े कुछ नए सवाल उठाएंगे और ऐसी भ्रामक बातों का जवाब भी देंगे जो पिछले 72 वर्षों से संचार के अलग-अलग माध्यमों से आपके पास पहुंच रही हैं. कुछ राजनीतिक दल अब वोट के लिए सावरकर को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं. डिजाइनर मीडिया ने आज तक आपको राष्ट्रवाद के नायक का सच नहीं बताया होगा क्योंकि अखबार से लेकर कोर्स की किताबों तक हर जगह आपको एकतरफा इतिहास दिखाया गया है. ऐसा करके देश के लिए सावरकर के बौद्धिक और राष्ट्रीय योगदान की बात नहीं की गई. उसे छिपाकर रखने की कोशिश की गई है. आज का विश्लेषण सावरकर के खिलाफ काम कर रही उसी विचारधारा पर चोट करेगा.
आश्चर्य की बात ये है कि आज देश के कुछ नेता वीर सावरकर के लिए देश के सर्वोच्च सम्मान की मांग के खिलाफ एजेंडा चला रहे हैं. जो लोग दिन भर Air Conditioned कमरों में रहते हैं और एक दिन के लिए भी कड़ी धूप में खड़े नहीं रह सकते. वो लोग 10 साल तक कालापानी की सज़ा झेलने वाले वीर सावरकर के व्यक्तित्व और वीरता पर सवाल उठाते हैं. ऐसे लोगों को हम इतिहास के कटु सत्यों की जानकारी देना चाहते हैं. आज देश को कालापानी में कैद विद्रोहियों की स्थिति और भारत की जेलों में बंद जवाहरलाल नेहरू जैसे राजनीतिक कैदी की स्थिति पर भी गौर करना चाहिए.
आपने अक्सर देश की अलग-अलग जेलों में कुछ खास कैदियों को मिलने वाली फाइव स्टार सुविधाओं की बात सुनी होगी. लेकिन आज आपको बताएंगे कि कैसे आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे कुछ नेताओं के साथ भी ऐसा ही व्यवहार होता था. पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर लिखी गई एक किताब... Jawaharlal Nehru, a Biography में उनकी जेल यात्रा के बारे में विस्तार से बताया गया है. इस किताब के पेज नंबर 72 पर लिखा गया है, इसके मुताबिक पंडित जवाहरलाल नेहरू Class A राजनीतिक कैदी थे. इसका मतलब है कि राजनीतिक कैदियों में उनका स्थान सर्वोच्च था. पंडित नेहरू को अलग Cell में बंद करके रखा जाता था, जिसमें अलग बाथरूम की सुविधा भी थी. उन्हें अपना काम करवाने के लिए एक नौकर भी मिलता था, जो इसी जेल में बंद कोई सामान्य कैदी होता था. जेल में रखे जाने के दौरान पंडित नेहरू को पढ़ने, किताब लिखने, सोच विचार करने और घर से पत्र पाने की भी इजाजत थी. कई बार पंडित नेहरू उनसे मिलने आए जेल में बंद दूसरे कैदियों को लेक्चर भी दिया करते थे. लेखक ने ये भी लिखा है कि कई बार नेहरू ये भी सोचते थे कि इस तरह लगातार वर्षों तक जेल में बंद रहना उचित है भी या नहीं.
इस बारे में और जानकारी के लिए आप भी ये किताब... Jawaharlal Nehru, a Biography को पढ़ सकते हैं. इससे आजादी की लड़ाई लड़ने वाले सच्चे नायकों के बारे में आपकी जानकारी बढ़ेगी. अब आपको आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे दूसरे राजनीतिक कैदी महात्मा गांधी के बारे में जानना चाहिए. महात्मा गांधी के अलग-अलग लेख और पत्र को मिलाकर एक किताब लिखी गई है जिसका नाम है Collected works of Mahatma Gandhi... इसके Volume 23 में पेज 158 पर क्या लिखा गया है ये जानिए... वर्ष 1922 में महात्मा गांधी पुणे की येरवदा जेल में बंद थे. यहां उनसे खाने के बारे में सवाल पूछा गया. तो गांधी जी ने कहा कि उनको बकरी का दूध और ब्रेड खाने के लिए दिया जाता था. आपको पता होगा कि राष्ट्रपिता को बकरी का दूध बहुत पसंद था. और इसके साथ उन्हें खाने के अलावा हर दिन दो संतरे भी दिए जाते थे. 14 अप्रैल 1922 को गांधी जी ने अपने सहयोगी को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने बताया था कि उन्हें येरवदा जेल में अलग कोठरी में रखा गया है. उनके लिए बाथरूम की भी अच्छी व्यवस्था की गई है और काम करने के लिए अलग कमरा भी दिया गया है. यहां उन्हें 2 नए गर्म कंबल, सोने के लिए गद्दा, 2 चादरें और तकिया भी दिया गया.
आपने जवाहरलाल नेहरू के साथ जेल में हो रहे अच्छे व्यवहार के बारे में समझा और जाना. अब आपको ऐसा लग रहा होगा कि ज्यादातर स्वतंत्रता सेनानियों के साथ अंग्रेज ऐसा ही अच्छा व्यवहार करते होंगे. लेकिन सच्चाई इससे एकदम अलग है. आज आपको ये भी जानना चाहिए कि दूसरे राजनीतिक कैदियों और सावरकर की सज़ा में क्या अंतर था. क्योंकि वीर सावरकर को जो सजा दी गई वो सुनकर भी आपको बहुत दुख होगा और आप सोचेंगे कि किसी के साथ ऐसा व्यवहार कैसे किया जा सकता है. जब अंग्रेज़ों के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना विद्रोह तेज़ किया तो ब्रिटिश सरकार ने भी यातना देने के नए-नए तरीके ढूंढ लिए थे. भारत की आज़ादी के लिए जंग लड़ने वाले बहादुर बेटों को अंडमान-निकोबार की Cellular Jail में तरह-तरह की यातनाएं दी जाती थीं. जिसे काला पानी कहा जाता था. जेल में बंद स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को बेड़ियों से बांधा जाता था. उनसे कोल्हू से तेल निकालने का काम करवाया जाता था.
वर्ष 1911 में वीर सावरकर को काला पानी की सजा दी गई थी और अंडमान द्वीप ले जाकर उन्हें भयंकर यातनाएं दी गईं. इस बारे में आपको ज्यादा जानकारी देने के लिए हमने गहन अध्ययन किया है. कई किताबों को पढ़ा है. सावरकर पर एक किताब लिखी गई है जिसका नाम है 'Savarkar: Echoes from a forgotten past'. इसके लेखक हैं इतिहासकार विक्रम संपत. इस किताब के पेज नंबर 279 पर विस्तार से बताया गया है कि Cellular Jail में कैदियों के साथ किस तरह से थर्ड डिग्री टॉर्चर किया जाता था. यानी राजनीतिक कैदियों के साथ 5 स्टार व्यवहार होता था. लेकिन वीर सावरकर जैसे कैदियों को बहुत कष्ट दिया जाता था. अब आप खुद ही सोच लीजिए कि सावरकर पर अंग्रेजों से मिले होने का आरोप कितना निराधार है.
आप जब भी अपने देश के स्वतंत्रता सेनानियों को याद करें. तो काला-पानी को कभी ना भूलें. क्योंकि, ये वो जेल है जो आज़ादी के 72 वर्षों के बाद भी अंग्रेजों की बर्बर सोच का सबसे बड़ा सबूत है. ये एक दुखद सत्य है, कि बदलते वक्त के साथ-साथ हमने ‘सज़ा-ए-कालापानी’ के इतिहास को भुला दिया है. अंडमान-निकोबार की Cellular Jail में देश के हज़ारों बेटों ने काला पानी की सजा काटी. और अंग्रेज़ों द्वारा बरसाए गए कोड़ों के दर्द को सहन किया. वो वीर क्रांतिकारी ज़ंजीरों में भी जकड़े गए और उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े भी किए गए. लेकिन उनके आज़ाद विचारों को कोई क़ैद नहीं कर पाया.
सावरकर की वीरता को कम दिखाने के लिए विरोधियों का एक और Propaganda है. अंग्रेज सरकार को लिखा गया माफीनामा. दुष्प्रचार किया जाता है कि वीर सावरकर ने अंग्रेज़ों से माफी मांगी थी. लेकिन ये सावरकर की रणनीति का सिर्फ एक पक्ष है. सच्चाई ये है कि सावरकर जेल से बाहर रहकर देश की सेवा करना चाहते थे. वो ये मानते थे कि मातृभूमि की सेवा करने के लिए उन्हें काल कोठरी से आज़ाद होना होगा. सिर्फ माफी मांगने को आधार बनाकर सावरकर का नकारात्मक मूल्यांकन करना, उनके साथ अन्याय करने जैसा है.
आजादी की लड़ाई में कई बार महापुरुषों ने अपना लक्ष्य पाने के लिए अलग-अलग रणनीति अपनाई. इसमें कुछ मौके ऐसे भी आए जब ऐसा लगा मानो हमारे जननायक अंग्रेजों के साथ खड़े हैं. लेकिन सच्चाई इसके ठीक उलट थी. महात्मा गांधी ने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों का साथ दिया था क्योंकि तब अंग्रेजों ने महात्मा गांधी को ये भरोसा दिलाया था कि अगर भारत के लोग प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों का साथ देंगे तो वो भारत को आज़ाद करने पर विचार करेंगे. इसके लिए अंग्रेज़ों ने कांग्रेस पार्टी के नेताओं से ये अपील की थी कि भारत के लोगों को अंग्रेज़ों की सेना में भर्ती करवाया जाए. महात्मा गांधी ने खुद ये जिम्मेदारी ली थी. उन्होंने भारत के लोगों को अंग्रेज़ों की सेना में भर्ती होने के लिए अपील की थी.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसी दौरान भारत के वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड को एक पत्र लिखा था. इस पत्र की कुछ लाइनें हम आज पूरे देश को सुनाना चाहते हैं. महात्मा गांधी ने लिखा था कि युद्ध के दौरान अगर मेरा बस चले तो मैं भारत के हर सक्षम निवासी को ब्रिटिश साम्राज्य की सेवा में बलिदान कर दूं. हमें ये मानना चाहिए कि अगर हम ब्रिटिश साम्राज्य की सेवा कर पाए तो उस सेवा के माध्यम से ही हमने स्वराज पा लिया. इसलिए मेरी नजर में ये साफ है कि हमें अपने हर व्यक्ति को ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा में लगा देना चाहिए. पत्र के आखिर में महात्मा गांधी ने लिखा... मैं ऐसा लिख रहा हूं- क्योंकि मैं ब्रिटिश राष्ट्र से प्यार करता हूं और मैं हर भारतीय में अंग्रेजों के प्रति वफादारी पैदा करना चाहता हूं.
इन शब्दों को देख और सुनकर आप भी समझ गए होंगे कि ये महात्मा गांधी के असली विचार नहीं हो सकते हैं. ऐसा करके उन्होंने शायद ब्रिटिश साम्राज्य को अपनी तरफ से निश्चिंत करने की एक कोशिश की होगी. गांधी जी ने अंग्रेजों को दिए गए सावरकर के माफीनामे पर क्या कहा आज ये भी आपको जानना चाहिए. महात्मा गांधी ने कहा था कि... 'उन्होंने ((सावरकर ने)) स्थिति का लाभ उठाते हुए क्षमादान की मांग की थी, जो उस दौरान देश के अधिकांश क्रांतिकारियों और राजनीतिक कैदियों को मिल भी गई थी'. 'सावरकर जेल के बाहर रहकर देश की आजादी के लिए जो कर सकते थे वो जेल के अंदर रहकर नहीं कर पाते'. राष्ट्रपिता की इन बातों से वीर सावरकर के खिलाफ एजेंडा चलाने वाले लोगों का भ्रम दूर हो जाना चाहिए. क्योंकि सावरकर अंग्रेजों के सामने झुके नहीं थे बल्कि देश की सेवा करने के लिए जेल से बाहर आना चाहते थे.
वीर सावरकर से जुडे इतिहास को हमेशा गलत तरह से पेश किया गया खासतौर से राष्ट्रपति महात्मा गांधी की हत्या को लेकर. महात्मा गांधी की हत्या में शामिल होने के आरोप में वीर सावरकर को गिरफ्तार किया गया था और उन पर मुकदमा चला. वर्ष 1948 में कोर्ट ने महात्मा गांधी की हत्या के आरोप से उन्हें बरी कर दिया. मुकदमे की सुनवाई के दौरान नाथूराम गोडसे ने भी कोर्ट को बताया कि जब उसने गांधी जी का विरोध किया तो सावरकर ने उसकी आलोचना की थी. लेकिन कानून के दस्तावेज़ में दर्ज इन तथ्यों को आज भी राजनीतिक एजेंडा चलाकर गलत तरह से फैलाया जा रहा है.
अब आप ये समझिए कि कैसे कांग्रेस का चरित्र शुरू से ही लिंचिंग वाला रहा है. जिस तरह से इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के दंगों में कांग्रेस नेताओं पर भीड़ को भड़काने और सिखों की लिंचिंग के आरोप हैं. ठीक उसी तरह गांधी जी की हत्या के बाद भी कांग्रेस के नेता जीप में बैठकर बाकायदा घोषणा करते थे कि अगर किसी ने भी वीर सावरकर के परिवार को शरण दी तो उसके घर के जला दिया जाएगा. इतना ही नहीं उस समय वीर सावरकर के भाई पर हमला भी हुआ था जिसके बाद उनकी मौत हो गई थी. यानी कांग्रेस का राजनीतिक लिचिंग का चरित्र वर्ष 1948 से ही जारी है और इसका शिकार वो नायक हुए हैं जो कांग्रेस से अलग विचार रखते हैं.

साभार अश्वनी शर्मा जी।

अमानवीय कृत्य पूरी 'इंसानियत' को शर्मसार करते हैं

सिर्फ डिग्रियों के रूप में कागज का टुकड़ा बटोर के खुद पर इतराना, साथ -साथ बुद्धि के अभाव में ऐसे अमानवीय कृत्य करना पूरी 'इंसानियत' को शर्मसार करने वाली बात है। विडंबना तो यह हैं कि केरल जैसे राज्य जहां 'साक्षरता दर' सबसे ज्यादा है। इस धरा पर प्रलय स्वरूप घटनाओं का घटना ये साबित करता है कि सच मे मानव इसी के लायक हैं। एक भूखी हथिनी, अपने भोजन की तलाश में रिहायशी इलाके में जाती है, इस आशा के साथ कि मानव 'करुणामयी' होता है। एक बार को तो वो शायद भूख सहन भी कर लेती, पर एक माँ का दिल अपने कोख में पल रहे बच्चे को भूखा कैसे रहने देता। कितनी दुआएं निकली होगी उसके दिल से उस के लिए, जब उसका भोजन (अन्नास) दिया गया होगा, किसी अमानव द्वारा! उसे इस बात का एहसास कहाँ कि, इसमें विस्फोटक सामग्री मिलाई गई है ताकि उसके दर्द को खेल समझकर, एक जानवर को धोखा देने में सफल होकर अपने सफलता का आनन्द उठाया जा सके। इस आशा के साथ कि उसके पेट में पल रहे बच्चे को और भूखा नहीं रहना होगा, उसने उस अन्नास को ग्रहण किया होगा।
फिर जो विस्फोट उसके जबड़े के अंदर हुआ होगा, उसके दर्द का अनुमान लगाना भी मुश्किल है। बावजूद इसके उस हथिनी ने किसी पर भी आक्रोश नहीं दिखाया, वो चाहती तो शायद पूरी बस्ती उजाड़ सकती थी। शायद वो समझ गयी थी कि 'जानवर' कौन है?
चुपचाप जाकर पास के तालाब में खड़ी हो गयी, शायद उसके पेट में पल रहे बच्चे ने पूछा होगा उससे की माँ मेरा कसूर क्या है? मुझे ऐसी खूबसूरत दुनिया को तुमने देखने क्यों नहीं दिया? तब उस हथिनी ने बताया होगा ये दुनिया हसीन नहीं और मेरे लाल तुम ऐसी दुनिया में न ही आओ तो बेहतर है और उसने उस पानी में ही प्राण त्याग दिया। हथिनी और उसके बच्चे के साथ 'मानवता' और 'विश्वास, का भी देहावसान हो गया।
अचानक लोग रातोंरात पशु प्रेमी बन रहे हैं। मुझे पता है कि यह बहुत क्रूर है। लेकिन अन्य मृत जानवरों को खाने के दौरान हाथी के बारे में रोना हाइपोक्रेसी है। हाथी की मौत पर लोग रो रहे हैं और लाखों जानवरों को रोज़ निर्दयता पूर्वक मार कर खा रहे हैं, इसे ही प्रजातिवाद कहा जाता है। हथनी पे शोर इसलिए हो रहा है क्योंकि हथनी मुर्गे,मछली,गाय, बकरे,भैंस,तीतर,केकड़ा की तरह रोज नहीं कटती, अगर हथनी को मारने वाले राक्षस हैं तो इनको मारने वाले भी क्रूर राक्षस ही हैं। मुर्गा,बकरे की जान लेकर उमा देवी के लिए आंसू बहाना बेकार है।
दर्द उस मुर्गे और बकरे को भी उतना ही होता है जितना उमा हथिनी को हुआ होगा।
सेलेक्टिव दर्द दिखाने से क्या होगा भाइयो?
केरल में जो 1 गर्भवती हथिनी के साथ हुआ वो बहुत ही घिनोना हुआ और हम सब इसके खिलाफ आवाज उठा भी रहे हैं। जिन्होंने ये किया उन्हें सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। लेकिन ऐसा तो हर रोज होता है कितनी गर्भवती मुर्गी, कितनी गर्भवती बकरी हर रोज काट कर प्लेट में खाने के लिए सजा दी जाती है, लेकिन कोई उनके लिए आवाज नहीं उठाता, क्या ये इस समाज का दोगलापन नहीं है? जिसने उस हथिनी से जीने का अधिकार छीना है।
पुराणों के अनुसार भगवान कल्कि का अवतार तब होगा जब मनुष्यों में से दया, प्रेम, करूणा की भावना समाप्त हो जाएगी। ऐसे कृत्य को देख कर लगता है की बस वो दिन ज्यादा दूर नहीं, सर्वनाश ज्यादा दूर नहीं।

साभार अश्वनी शर्मा जी। ...

Friday, July 17, 2020

सोने के पानी से लिखी मिलीं किताबें

115 साल बाद खोला महाराणा_स्कूल का कमरा, सोने के पानी से लिखी किताबें मिलीं
इतिहास के पन्नों में दर्ज धौलपुर के महाराणा स्कूल के कुछ कमरों को पिछले दिनों 115 साल बाद खोला गया। इतने सालों तक इन कमरों को इसलिए नहीं खोला गया था क्योंकि स्थानीय प्रशासन यह समझता था कि इनमें कबाड़ पड़ा होगा। लेकिन दो महीने पहले मार्च में जब 2-3 कमरे खोले गये तो, वहां मौजूद ‘खजाना’ देख लोगों को होश उड़ गये। असल में इन कमरों से इतिहास की ऐसी धरोहरें रखी गई थीं, जो आज बेशकीमती हैं।
धौलपुर के govt. महाराणा स्कूल के 3 कमरों में मिले राणा उदयभानु सिंह जी के इतिहास सम्बन्धित लाखों दुर्लभ पुस्तकों का भंडार।
कमरों से प्रशासन को ऐसी किताबें मिली हैं जो कई सदी पुरानी हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ये किताबें बेशकीमती हैं। इन किताबों में कई ऐसी किताबें हैं, जिनमें स्याही की जगह सोने के पानी का इस्तेमाल किया गया है। इतिहासकार इस अनोखे खजाने को लेकर बहुत उत्साहित हैं। उनका कहना है कि इन किताबों को सहेज कर रखना जरूरी है, ताकि भविष्य में इन किताबों से छात्रों को बहुत अहम जानकारी मिले।
स्कूल के दो से तीन कमरों में एक लाख किताबें तालों में बंद पड़ी मिली। अधिकांश किताबें 1905 से पहले की हैं। महाराज उदयभान दुलर्भ पुस्तकों के शौकीन थे। ब्रिटिशकाल में महाराजा उदयभान सिंह लंदन और यूरोप यात्रा में जाते थे। तब ने इन किताबों को लेकर आते थे। इन किताबों में कई किताबें ऐसी हैं जिनमें स्याही की जगह सोने के पानी का इस्तेमाल किया गया है। 1905 में इन किताबों के दाम 25 से 65 रुपये था । जबकि उस दौरान सोना 27 रुपये तोला था। ऐसे में मौजूदा समय में इन 1-1 किताब की कीमत लाखों में आंकी जा रही है। सभी पुस्तकें भारत, लंदन और यूरोप में छपी हुई हैं।
इनमें से एक किताब 3 फीट लंबी है। इसमें पूरी दुनिया और देशों की रियासतों के नक्शे छपे हैं। खास बात यह है कि किताबों पर गोल्डन प्रिंटिग है। इसके अलावा भारत का राष्ट्रीय एटलस 1957 भारत सरकार द्वारा मुद्रित, वेस्टर्न-तिब्बत एंड ब्रिटिश बॉडर्र लेंड, सेकड कंट्री ऑफ हिंदू एंड बुद्धिश 1906, अरबी, फारसी, उर्दू और हिंदी में लिखित पांडुलिपियां, ऑक्सफोर्ड एटलस, एनसाइक्लोपीडिया, ब्रिटेनिका, 1925 में लंदन में छपी महात्मा गांधी की सचित्र जीवनी द महात्मा भी इन किताबों में निकली है।
इतिहासकार गोविंद शर्मा बताते हैं – महाराजा उदयभान सिंह को किताबें पढ़ने का शौक था। ब्रिटिशकाल में वे जब भी लंदन और यूरोप की यात्रा पर जाते थे, तब वहां से किताबें जरूर लाते थे। उन्होंने खुद भी अंग्रेजी में सनातन धर्म पर एक पुस्तक लिखी थी। जिसका विमोचन मदन मोहन मालवीय ने किया था। धौलपुर राज परिवार की शिक्षा में इतनी रुचि थी कि उन्होंने बीएचयू के निर्माण में भी मदन मोहन मालवीय को बड़ी धनराशि प्रदान की थी।
राणा_उदयभानु_सिंह_जी का इतिहास दशकों बाद फिर से उफ़ान लेता हुआ धौलपुर के govt. महाराणा स्कूल के 3 कमरों में मिला लाखों दुर्लभ_पुस्तकों का भंडार।
महाराणा स्कूल के प्रधानाचार्य रमाकांत शर्मा ने कहा – हैरानी की बात यह है कि पिछले 115 सालों में कई प्रधानाचार्य और तमाम स्टाफ बदल गया। लेकिन, किसी ने भी बंद पड़े इन तीन कमरों को खुलवाकर देखना उचित नहीं समझा। मैंने भी इन कमरों को कई बार देखा। जब भी इनके बारे में स्टाफ से पूछा गया तो हर बार एक ही जवाब मिला कि इनमें पुराना कबाड़ भरा पड़ा है। मैंने भी कबाड़ को साफ कराने की नीयत से इन कमरों को खुलवाया

साभार अश्वनी शर्मा जी। ...

पत्रकारिता 1

पत्रकारिता का जंतर-मं तR प्रेस विज्ञप्तियों का अपना मिजाज होता है अखबार के दफ्तरों में प्रेस ब्रीफिंग, प्रेस कॉन्फ्रेंस, प्रेस विज्ञप्ति बहु...