प्रत्येक इंसान की चाहत होती है कि उसका एक साथी हो ...जिसके साथ वह अपने अधूरेपन को बांट सके... इंसान कैसा भी हो उसके अंदर एक साथी की चाहत होती है...
एक ऐसा साथी जिसके साथ वह अपनी वेदनाओं को ...अपनी संवेदनाएं को बांट सके और खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें... इसके लिए जरूरी होता है कि घर बसाया जाए... फिर भी एक शांतचित्त जीत वाले व्यक्ति के मन में यह सवाल उठते रहता है ...कि एक आदमी घर क्यों बताता है... वह किसी के साथ विवाह के बंधन में क्यों बंधना चाहता है... सिर्फ इसलिए क्योंकि वह अपने को अधूरा समझता है... इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए वह वैवाहिक संबंध में बंधता है...आखिर ऐसा क्या है कि हर व्यक्ति अपने जीवन में एक अधूरापन अनुभव करता है... एक प्रकार का खालीपन महसूस करता है ...और उस अधूरेपन को पूर्ण करने के लिए... उसे भरने के लिए... उसे एक साथी की आवश्यकता पड़ती है... अपने जीवन की इस अपूर्णता और अपने अधूरेपन की पूर्णता में बदलने के लिए...उसे विवाह की आवश्यकता होती है... लेकिन जहां तक इस विषय के बारे में विचार है ...प्राकृतिक संरचनाओं निर्बाध रूप से चलते रहे इसके लिए विवाह आवश्यक है.... लेकिन इसे अनिवार्य नहीं बनाना चाहिए... इसे प्रत्येक व्यक्ति के अपने व्यक्तिगत निर्णय पर छोड़ देना चाहिए.... ,हालांकि यह प्रामाणिक विषय है कि विवाह किसी दूसरे के अधूरेपन को पूर्ण करना नहीं अपितु अपने अधूरेपन को दूर करना है।
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