सिर्फ डिग्रियों के रूप में कागज का टुकड़ा बटोर के खुद पर इतराना, साथ -साथ बुद्धि के अभाव में ऐसे अमानवीय कृत्य करना पूरी 'इंसानियत' को शर्मसार करने वाली बात है। विडंबना तो यह हैं कि केरल जैसे राज्य जहां 'साक्षरता दर' सबसे ज्यादा है। इस धरा पर प्रलय स्वरूप घटनाओं का घटना ये साबित करता है कि सच मे मानव इसी के लायक हैं। एक भूखी हथिनी, अपने भोजन की तलाश में रिहायशी इलाके में जाती है, इस आशा के साथ कि मानव 'करुणामयी' होता है। एक बार को तो वो शायद भूख सहन भी कर लेती, पर एक माँ का दिल अपने कोख में पल रहे बच्चे को भूखा कैसे रहने देता। कितनी दुआएं निकली होगी उसके दिल से उस के लिए, जब उसका भोजन (अन्नास) दिया गया होगा, किसी अमानव द्वारा! उसे इस बात का एहसास कहाँ कि, इसमें विस्फोटक सामग्री मिलाई गई है ताकि उसके दर्द को खेल समझकर, एक जानवर को धोखा देने में सफल होकर अपने सफलता का आनन्द उठाया जा सके। इस आशा के साथ कि उसके पेट में पल रहे बच्चे को और भूखा नहीं रहना होगा, उसने उस अन्नास को ग्रहण किया होगा।
फिर जो विस्फोट उसके जबड़े के अंदर हुआ होगा, उसके दर्द का अनुमान लगाना भी मुश्किल है। बावजूद इसके उस हथिनी ने किसी पर भी आक्रोश नहीं दिखाया, वो चाहती तो शायद पूरी बस्ती उजाड़ सकती थी। शायद वो समझ गयी थी कि 'जानवर' कौन है?
चुपचाप जाकर पास के तालाब में खड़ी हो गयी, शायद उसके पेट में पल रहे बच्चे ने पूछा होगा उससे की माँ मेरा कसूर क्या है? मुझे ऐसी खूबसूरत दुनिया को तुमने देखने क्यों नहीं दिया? तब उस हथिनी ने बताया होगा ये दुनिया हसीन नहीं और मेरे लाल तुम ऐसी दुनिया में न ही आओ तो बेहतर है और उसने उस पानी में ही प्राण त्याग दिया। हथिनी और उसके बच्चे के साथ 'मानवता' और 'विश्वास, का भी देहावसान हो गया।
अचानक लोग रातोंरात पशु प्रेमी बन रहे हैं। मुझे पता है कि यह बहुत क्रूर है। लेकिन अन्य मृत जानवरों को खाने के दौरान हाथी के बारे में रोना हाइपोक्रेसी है। हाथी की मौत पर लोग रो रहे हैं और लाखों जानवरों को रोज़ निर्दयता पूर्वक मार कर खा रहे हैं, इसे ही प्रजातिवाद कहा जाता है। हथनी पे शोर इसलिए हो रहा है क्योंकि हथनी मुर्गे,मछली,गाय, बकरे,भैंस,तीतर,केकड़ा की तरह रोज नहीं कटती, अगर हथनी को मारने वाले राक्षस हैं तो इनको मारने वाले भी क्रूर राक्षस ही हैं। मुर्गा,बकरे की जान लेकर उमा देवी के लिए आंसू बहाना बेकार है।
दर्द उस मुर्गे और बकरे को भी उतना ही होता है जितना उमा हथिनी को हुआ होगा।
सेलेक्टिव दर्द दिखाने से क्या होगा भाइयो?
केरल में जो 1 गर्भवती हथिनी के साथ हुआ वो बहुत ही घिनोना हुआ और हम सब इसके खिलाफ आवाज उठा भी रहे हैं। जिन्होंने ये किया उन्हें सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। लेकिन ऐसा तो हर रोज होता है कितनी गर्भवती मुर्गी, कितनी गर्भवती बकरी हर रोज काट कर प्लेट में खाने के लिए सजा दी जाती है, लेकिन कोई उनके लिए आवाज नहीं उठाता, क्या ये इस समाज का दोगलापन नहीं है? जिसने उस हथिनी से जीने का अधिकार छीना है।
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