पिछले दिनों मैं ग्वालियर गया था । जिस टीम के साथ इस पांच दिवसीय यात्रा पर गया था, उसमें मेरे साथ तीन और बेहद खास लोग शामिल थे ।
काफी व्यस्त कार्यक्रमों के बीच मैंने ग्वालियर शहर की भव्यता ऐतिहासिकता और प्राचीनता से रूबरू होने का निश्चय किया। इसके लिये मैंने शहर के ऐतिहासिक स्थलों व इमारतों की एक सूची तैयार कर उसे क्रमबद्ध करने की योजना पर अमल किया।
वैसे तो ग्वालियर शहर का नाम सुनते ही मन रोमांच से भर जाता है। भला ऐसा क्यूं न हो । इस शहर का स्थान भारत के चुनिंदा ऐतिहासिक शहरों में जो शामिल है। यह शहर भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास को स्वयं में समेटे हुए है । मैंने कुछ स्थलों को अपने सूची में प्राथमिकता दिया , जिनमें ग्वालियर किला, मनमंदिर महल ,जयविलास भवन ,सास बहू मंदिर, तेली का मंदिर, जौहर कुंड, गुरुद्वारा दाता बंदी साहिब ,तानसेन का मकबरा और झांसी की रानी का समाधि स्थल मुख्य थे ।
ग्वालियर किला देखने के साथ ही मैंने सूचीबद्ध किये गए सारे स्थलों को एक के बाद एक क्रमबद्ध तरीके से देखा ।शाम ढलने वाली थी। मैं अपनी टीम के साथ ग्वालियर से वापस लौट रहा था, लेकिन मेरा मन कचोट रहा था।
हम लोगों को वापस पटना भी लौटना था । झांसी की रानी के समाधि स्थल नहीं जाने के कारण मन विचलित था ।लेकिन शायद किस्मत में रानी के समाधि स्थल पर जाना लिखा था ।देखिए ! किस्मत कनेक्शन के साथ संयोग भी गजब का बैठा । स्टेशन वापसी के क्रम में जो रास्ता चुना, उसी रास्ते पर तानसेन का मकबरा और झांसी की रानी की समाधि स्थल दोनों था।
मुझे अचानक से बने इस संयोग पर एक पल के लिए यकीन नहीं हुआ। लेकिन यह संयोग वास्तविकता में आकार ले चुका था। मेरे सामने रानी के समाधि स्थल का मुख्य द्वार था। मेरी नजर सबसे पहले मध्य प्रदेश सरकार के उस बोर्ड पर जाकर टिकी , जिस पर मोटे मोटे अक्षरों में लिखा था राज्य संरक्षित स्मारक महारानी लक्ष्मी बाई ग्वालियर।
मुझे ऐतिहासिक स्थलों पर जाना और उनसे रूबरू होना हमेशा से अच्छा लगता रहा है। ग्वालियर शहर का अपना इतिहास समृद्ध है। शहरवासियों ने अपने इस विरासत को बड़े जतन के साथ संभाल कर रखा है । घूमने के लिए मैं जहां भी गया वहां साफ-सफाई व सुरक्षा व्यवस्था उच्च कोटि का दिखा। रानी लक्ष्मीबाई के समाधि स्थल का परिसर एक बड़े भूभाग में फैला हुआ है।परिसर पूरी तरह से हरा भरा है । चहारदीवारी के साथ सुरक्षा प्रभारी व कृत्रिम प्रकाश की व्यवस्था उच्च कोटि की ।
ग्वालियर किला से स्टेशन हमलोग ऑटो से वापस आ रहे थे ।ऑटो वाले भैया बहुत ही भद्रजन निकले । रास्ते में उन्होंने ग्वालियर राजघराने, झांसी की रानी के बारे में बताने के साथ ही प्रदेश की मौजूदा सरकार के बारे में भी अपने नपे तुले शब्दों में बता रहे थे।
सिंधिया राजघराना उस समय का सबसे समृद्ध और शक्तिशाली राजघरानों में से एक था । झांसी की कमान लक्ष्मीबाई के हाथ से निकल जाने के बाद उन्होंने गोरों के खिलाफ आजादी के अपने बिगुल को शांत नहीं होने दिया । झांसी की रानी ने तात्या टोपे को साथ लेकर फिर से एक सैन्य टुकड़ी का गठन किया । इस सैन्य टुकड़ी में लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों को भी अपने साथ मिलाया ।उन्होंने बड़ी आसानी से ग्वालियर किला को अपने कब्जे में ले लिया।
गोरों के साथ लड़ाई में रानी लक्ष्मीबाई का साथ वहां के स्थानीय साधू सन्यासियों ने भी दिया ।आज भी वहां सारे साक्ष्य मौजूद हैं जो रानी के संघर्ष की कहानी बयां करते हैं । वहां उन साधुओं की भी समाधि स्थल है जो 1857 के समय में रानी का साथ दिये थे। साधु गंगादास ने झांसी की रानी का अंतिम संस्कार अपनी कुटिया में आग लगाकर किया ।
झांसी की रानी की समाधि स्थल शहर के बीचों बीच मुख्य मार्ग पर है। गेट से अंदर हमलोग दाखिल हुए तो सामने एक विशालकाय घोड़े पर बैठे रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा दिखा।और उसके सामने उनकी समाधिस्थल । इन दोनों के बीच जलती हुई शहीद ज्योति है। जो हमेशा जलती रहती है। और हमें रानी के सर्वोच्च बयान बलिदान को स्मरण कराती है ।
अंत में मैं यही कहूंगा कि अगर आपको कभी भी ग्वालियर जाने का मौका मिले तो झांसी की रानी के समाधि स्थल पर जरूर जाएं
मान सिंह का किला ( avinash )




No comments:
Post a Comment