Thursday, July 23, 2020

राजस्थान में कांग्रेस ने अपने पैर पर मार ली कुल्हाड़ी

  • दिसंबर 2018 में विधानसभा चुनाव के दौरान पायलट ने पूरे चुनाव को फ्रंट से लीड किया था।

  • सचिन पायलट के कांग्रेस छोड़ने से गुर्जर भविष्य में कांग्रेस से दूर हो सकते हैं ।

कांग्रेस आलाकमान ने सचिन पायलट, महाराजा विश्वेन्द्र सिंह व रमेश मीणा को उनके पद से हटा दिया है। साथ ही युवक कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष मुकेश भाकर व सेवादल अध्यक्ष राकेश पारीक को भी उनके पद से हटा दिया है। इसके बाद राज्य के शिक्षा राज्य मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा को प्रदेश कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया गया है। इनके स्थान पर विधायक गणेश घोधरा को युवक कांग्रेस व हेमसिंह शेखावत को सेवादल का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है।एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष अभिमन्यु पूनिया ने भी पायलट के समर्थन में अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

अभी पूरा देश कोरोना से जूझ रहा है । संक्रमण के दौर में जहां सरकार को अपनी पूरी ताकत कोरोना पर काबू पाने के प्रयास करने में लगानी चाहिए। वहींं गहलोत सरकार के मंत्री आपस में ही लड़ रहे हैं। और प्रदेश में कोरोन तेजी से अपने पैर पसार रहा है ।प्रदेश में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या 25 हजार की संख्या को पाकर चुकी है। विधानसभा चुनाव के बाद जहां सचिन पायलट मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। वहींं अशोक गहलोत दिल्ली में जोड़-तोड़ कर मुख्यमंत्री बन गए थे। राजस्थान में तब से ही दोनों नेता एक दूसरे को कमजोर करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं।

कांग्रेस आलाकमान द्वारा राजस्थान में इस लड़ाई को रोकने की दिशा में कोई सकारात्मक कार्यवाही नहीं की गई थी, जिस कारण इनकी लड़ाई दिन प्रतिदिन बढ़ती ही गई। आज स्थिति सचिन पायलट द्वारा पार्टी से बगावत करने तक पहुंच गई है। जब राजस्थान में दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव मेंकांग्रेस को बहुमत मिला तो प्रदेश के हर कांग्रेसी को यही लग रहा था कि युवा नेता सचिन पायलट का मुख्यमंत्री बनना तय है । राजस्थान के प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव अविनाश पांडे गहलोत और पायलट में सुलह करवाते। मगर अविनाश पांडे सुलह कराने की बजाय खुद गहलोत के पक्ष में खड़े नजर आते रहे। राज्यसभा के चुनाव थे उस वक्त भी गहलोत और पायलट खेमे में खुलकर टकराव हुआ था।  

फरवरी 2014 में जब सचिन पायलट को राजस्थान कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया उस वक्त राजस्थान में कांग्रेस के मात्र 21 विधायक थे। दिसंबर 2013 में संपन्न हुए राजस्थान विधानसभा के चुनाव में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस बुरी तरह हार चुकी थी । ऐसे में सचिन पायलट ने प्रदेश अध्यक्ष बनते ही राजस्थान के हर जिले का धुआंधार दौरा किया व कार्यकर्ताओं से मिलकर उन्हें काम करने के लिए प्रेरित किया था। दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव में जब राजस्थान में कांग्रेस को बहुमत मिला तो प्रदेश के हर कांग्रेसी को यही लग रहा था कि युवा नेता सचिन पायलट का मुख्यमंत्री बनना तय है। क्योंकि राजस्थान में कांग्रेस को उबारने में जितनी मेहनत सचिन पायलट ने की थी। उतनी शायद ही अन्य किसी नेता ने नहीं की थी।

विधानसभा चुनाव  सचिन पायलट ने पूरे चुनाव को फ्रंट से लीड किया था। पायलट ने राजे सरकार की नाकामियों को आम जन जन तक पहुंचाया था। जिस कारण लोगों को लगा था कि एक युवा नेता के नेतृत्व में सरकार ब केनने से कांग्रेस पार्टी जनहित के मुद्दों पर काम करेगी।मगर जैसे ही चुनाव परिणाम कांग्रेस के पक्ष में आए। अशोक गहलोत ने अपने दिल्ली संपर्कों के बल पर मुख्यमंत्री बन गए। गहलोत के मुख्यमंत्री बनते ही पायलट समर्थको में जबरदस्त विरोध देखा गया था। मगर उस वक्त कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व कांग्रेस के अन्य बड़े नेताओं ने पायलट को मना कर उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी। इसके बाद 2018 में गहलोत के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेसी सभी 25 सीटों पर बुरी तरह हार गई थी...

ऐसा नहीं है कि सचिन पायलट ने यकायक बगावत कर दी हो। उन्होंने अपनी उपेक्षा की शिकायत बार-बार कांग्रेसी आलाकमान से की थी। मगर आलाकमान ने जो एक समन्वय समिति का गठन किया वह महज कागजी साबित हुई।मौजूदा घटनाक्रम में भले ही अशोक गहलोत विजेता बन के उभरे हो। मगर कांग्रेस को इसका खामियाजा आने वाले दिनों में उठाना पड़ सकता है। सचिन पायलट के कांग्रेस छोड़ने से राजस्थान में प्रभावशाली गुर्जर जाति के मतदाता भी भविष्य में कांग्रेस से दूर होंगे। सचिन पायलट युवा हैं तथा उनके पास राजनीति करने को बहुत समय है। यह कांग्रेस के लिए अच्छी खबर नहीं है। कांग्रेस में सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अशोक तंवर जैसे नेताओं को पार्टी छोड़ने से नहीं रोका गया तो दिन प्रतिदिन जनाधार खोती जा रही कांग्रेस को बचा पाना मुश्किल ही नहीं असंभव होगा।


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