जाटों के बारे में एक कहावत प्रचलित है... जाट पहले कोई काम करते हैं फिर उसके परिणामों के बारे में सोचते हैं...
ऐसा ही एक जाट मेरा मित्र है...वह किसी भी काम को करने के बाद ही उसके परिणाम के बारे में सोचता है..... लेकिन आज उसने सुबह सुबह ही मुझे फोन किया....और फोन पर ही तमतमाते हुए वह बोला ....हद हो गई मिश्रा जी ...इंसानियत का जमाना ही नहीं रहा...स्वार्थों से सभी घिरे हुए हैं... आज परिस्थिति करे कोई और भरे कोई वाली आ गई है.... उसके विचारों में उग्रता और विषय की गम्भीरता को समझते हुए मैंने बोला...तुम्हारे जीवन में ऐसा क्या भूचाल आ गया भाई...आज इतना क्यूं भड़क रहे हो...आखिर ऐसा क्या हो गया कि आज मेरा जाट कोई काम करने से पहले ही परिणाम के बारे में सोच कर परेशान लग रहा है...
इसके बाद उसने चिंतित भाव से बोला ....देखो मिश्रा जी...इससे अच्छा तो HIV था...जो करता था...वही भरता था...ये कोरोना तो सबको रुला रहा है...
फिर मैंने उसे कहा कि...तुम्हारी बात तो सौ फीसद सच है... लेकिन कोरोना तो समाजवादी निकला साहब...अमीर-गरीब सबको बराबर मिल रहा है... इसके लिए कोई धरना -प्रदर्शन भी नहीं कर रहा...आरक्षण की मांग तो कोसों दूर की बात है... मिल सबको रहा है... लेकिन इसे लेने के लिए कोई तैयार नहीं... सब इससे दूर भाग रहे हैं... इतने दूर कि अपने अपने घरों में ही दुबके हुए हैं...
थोड़ा और विचारों की गहराई में जाते हुए मैंने उनसे कहा...अब देखिये न साहब....इसके जैसा समाजवादी विचारक आज से पहले न हुआ था ....और न ही आगे पैदा होने के आसार दिख रहे हैं..... ये तो राजा और प्रजा में भी अंतर नहीं कर रहा...बूढ़े और जवान को भी नहीं छोड़ रहा...ये तो इतना समाजवादी है कि... किसी जमाने में पूरी दुनिया में राज करने वाले लोग को भी वैसे ही मिला... जैसे सड़क के किनारे... अपनी भूख और प्यास मिटाने के लिए... मुसाफिरों के आगे..
. दो पैसे के लिए गिड़गिड़ाने वाले लोगों को मिल रहा है...
अब देखिये इसकी उदारता ...ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स को भी यह मिला है...अमेरिका और जर्मनी के लोगों को भी मिल रहा...
मेरे भावपूर्ण विचारों को सुनकर मेरे मित्र ...थोड़े से हल्के हुए....इसके बाद मुस्कुराते हुए बोले....लग रहा है ...ये पक्का समाजवादी है... जवानी कुर्बान करने वाला नहीं लगता....
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