सुजीत कुमार। यही नाम है इनका। मेरे स्कूल के दिनों के मित्र हैं।आजकल भारत सरकार की महारत्न कम्पनी भेल में काम करते हैं। तश्वीर में बिटिया अद्विका और इनकी पत्नी हैं। भाभी जी कामकाजी महिला हैं और अस्पताल प्रबंधन में उच्च शिक्षा लेने के बाद हॉस्पिटल मैनेजमेंट का काम करती हैं। मेरे जीवन में इनका स्थान असाधारण है। ये बहुत अच्छे और गहरे मित्र हैं। 23 अगस्त को इनकी बिटिया अद्विका का जन्मदिन था। अद्विका का यह दूसरा जन्मदिन था। माता-पिता के लिए अपने बच्चों के जन्मदिन का विशेष उत्साह होता है। सुजीत के लिए भी यह मौका विशेष था। और विशेष हो क्यूं न भला। अद्विका इनदोनों की पहली संतान जो है।
Tuesday, August 25, 2020
Thursday, August 20, 2020
अजमेर और पुष्कर की मेरी यात्रा.....
सस्ती और सुलभ ठिकाने की तलाश
अजमेर स्टेशन पर उतरने के बाद सस्ते और सुलभ ठिकाने की खोज में भटकने लगा। चूंकि मैं विद्यार्थी । मेरे पास इतने पैसे नहीं थे जिससे औसत दर्जे का होटल या गेस्ट हाउस ले सकता था। कई छोटे-मोटे होटलों में गया तो उसका भाड़ा जेब पर भारी पर रहा था। इसलिए ठहरने के लिए धर्मशाला की तलाश करना ही बेहतर समझा। इस दौरान कई उच्कों से भेंट- मुलाकात हुई जो शिकार की तलाश में भंवरे की तरह स्टेशन परिसर में मडंरा रहे थे। स्टेशन परिसर से बाहर निकलने के बाद एक दवा दुकानदार से धर्मशाला के बारे में पूछा। दुकानदार ने एक हिंदू धर्मशाला का पता बताया। उस दुकानदार ने कहा कि यह धर्मशाला पास में ही पृथ्वीराज मार्ग पर है। रात के नौ बजने वाले थे। ढूंढते-ढूंढते धर्मशाला के गेट पर आ धमके। तबतक काफी थक चुके थे। अपना रूम बुक कराया। थोड़ा सुस्ताने के बाद कुछ खाने के लिए बाहर निकला। पेट में चूहे फर्राटा दौड़ की तरह उधम मचाए हुए थे। उस रात प्याजीपूरी खाकर भूख मिटाया। अगले दिन किताबें पलटते रहे।आना सागर झील
मैंने परीक्षा केन्द्र जाने के क्रम में देखा कि बहुत सारे लोग एक विशाल जलकुंड के पास खड़े होकर चहलकदमी कर रहे थे। वहां बड़ी-बड़ी गाड़ियां खड़ी थी। रेहड़ी वालों की दुकानें लगी हुई थी।ये मेरे लिए किसी अचंभे से कम नहीं था। पहली बार झील अपनी आखों से देख रहा था। बाद में मालूम चला कि उसका नाम आनासागर झील है। मालूम हो कि आनासागर झील का निर्माण पृथ्वीराज चौहान के पितामह आनाजी चौहान ने पारहवीं शताब्दी के मध्य में करवाया था। आनाजी ने इसका निर्माण काराया था इसलिए इसका नाम आनासागर झील पड़ा।
अजमेरशरीफ और ढाई दिन का झोपड़ा
अगले दिन सुबह छह बजे के करीब सूफीसंत मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के लिए निकले। ख्वाजा गरीब-नवाज की दरगाह ज्यादा दूरी पर नहीं था। निजाम गेट से दरगाह के अंदर प्रवेश किया। मेरे पास कोई समान नहीं था। सिर्फ एक छड़ी जिसके सहारे मैं चलता था। दरगाह सुबह-सुबह पहुंच गए थे। लोगों की भीड़ थोड़ी कम थी। एक खादिम ने वहां कि रसमें पूरी कराई। ढा़ई दिन का झोपड़ा- दरगाह से बाहर निकलकर एक चाय की दुकान पर गया। वहां चाय पीया। दुकान पर टीवी लगी थी। ढ़ाई के झोपड़ा के बारे में बताया जा रहा था। दुकानदार से ढ़ाई दिन के झोपड़ा जाने का रास्ता पूछा। धूप काफी तीखी हो चली थी। ढ़ाई दिन का झोपड़ा काफी उंचाई पर है। इसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने कराया था। कहा जाता है कि इसका निर्माण ढ़ाई में कराया गया था। इसलिए इसका नाम ढाई दिन का झोपड़ा रखा गया। बता दें कि यह कोई झोपड़ा नहीं है बल्कि एक मस्जिद है।इसके बारे में अलग- अलग कई कहानियां सुनने को मिल जाती है।
पुष्कर मंदिर में पूजापाठ
उसी दिन पुष्कर के लिए दो बजे बस से निकले। पहली बार पहाड़ी रास्तों से सफर कर रहा था। बस स्टॉप से उतरने के बाद ऑटो मंदिर जाने के लिए लिया। महाभारत में पुष्कर राज के बारे में लिखा है कि तीनों लोकों में मृत्युलोक महान है। और मृत्युलोक में देवताओं का सबसे प्रिय स्थान पुष्कार राज दुर्भाग्य से पुष्कर सरोवर में स्नान नहीं कर पाया। देह पर जल छिड़कर ब्रह्मा मंदिर में पूजा अर्चना किया। रास्ता दुर्गम होने को कारण जल्दी निकल लिये। चूंकि आठ बजे मुझे दिल्ली के लिए निकलना था। इस तरह मेरी अजमेर और पुष्कर की यात्रा मंगलमय पूरी हुई।
Monday, August 17, 2020
माल फूंकने पर ही होता था ज्ञान का प्रवाह
युद्धविराम के साथ शांतिप्रस्ताव
मेस महाराज जी के लड़के सर्वेश की शादी
और कितनी निर्भया.....
विरले इंसान ही आप दीपो भवः को चरितार्थ कर पाते हैं

अपना एक बेहतरीन साल देने के लिए धन्यवाद" हिंदुस्तान"
अविनाश मिश्रा । 30 मई 2019 के दिन शाम के तीन बज रहे थे और मोदी के दूसरे कार्यकाल का शपथ समारोह टीवी पर प्रसारित हो रहा था । वहीं दूसरी तरफ हिंदुस्तान , पटना के लिए मेरा टेस्ट लिया जा रहा था।
Saturday, August 15, 2020
यादें- एक सुनहरे पल की.....
अक्षयवटराय स्टेडियम में होता है मुख्य आयोजन
वैशाली जिले में मुख्य आयोजन कचहरी मैदान में होता है। अब इस कचहरी मैदान को अक्षयवटराय स्टेडियम के नाम से भी जाना जाता है। आज भी यह मैदान गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के लिए मुख्य आयोजन स्थल है।26 जनवरी और 15 अगस्त के मौके पर दादाजी तड़के सुबह जाग जाते और ऑफिस जाने की तैयारियों में जुट जाते थे। उस समय मेरे घर में अलार्म वाली घड़ी नहीं थी। रात में सोने के बाद जब भी नींद खुले उसके बाद सोते नहीं थे। सुबह के चार बजे तक सभी लोगों को जाग जाना है। ये नियम सबके ऊपर मेरे घर में लागू था।वो कचहरी जाने की तैयारियों में जुट जाते। घर के लोगों की भूमिका सहायक की होती थी। जब मैं छोटा था तो हर साल साथ चलने की जिद्द करता था। मुझे आज भी याद है वो बोलते कि अगले बार साथ लेकर चलेंगे। ये सिलसिला कई बरसों तक चलता रहा। आखिर में वो साल भी आया जब स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उनके साथ जाने का अवसर मिला। गणतंत्र दिवस के मौके पर ठंड़ के कारण कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया। घर से हम लोग साईकिल से निकले थे। उस समय सुबह के छह बज होंगे। उस समय कचहरी में साईकिल रखने के लिए कोई स्टैंड नहीं था। दादाजी ने अपनी साइकिल एक चाय की दुकान पर लगाया। वहां पहुंचते ही चायवाले दादाजी को चाय की गलास थमा दिये। और मुझे बिस्कुट खाने को दिया जबकि मेरा भी मन चाय पीने को था। ये बाद में मुझे पता चला कि वो चाय वाला मेरे गांव का ही था और आम के दिनों में आम के बगीचे की रखवाली भी करता था।
बहुत ही आकर्षक और भव्य था कार्यक्रम स्थल
इसके बाद हमलोग सीधे कार्यक्रम स्थल की ओर बढ़ चले। विशाल कचहरी मैदान का रमना मेरे आखों के सामने था। मेेरे जीवन का वो एक यादगार पल था। हमलोग सीधे मंच की ओर चले गए। वहां मुुझे कोई रोकने-टोकने वाला नहीं था। चुंकि मेरे दादाजी उसी टीमका हिस्सा थे जिसके जिम्में इसे तैयार करना था। दादाजी के एक सहकर्मी ने मुझे गुब्बारे और झंडे दिये। आठ बजे तक मंच सजकर तैयार हो चुका था। डीएम के सुरक्षाकर्मियों ने मंच से नीचे उतरने के लिेए निर्देश दिया। इसके बाद हमलोग सीढियों की तरफ चले गए। और तत्कालीन डीएम के आने का प्रतीक्षा में कर रहे थे। अगर मुझे सही-सही याद हो तो उस समय वैशाली जिले के डीएम उदय प्रताप सिंह थे। डीएम साहब का आगमन हुआ। उनके सफेद एम्बासडर कार के बारे में क्या कहा जाए। उसका आकर्षण किसी फिल्म के अभिनेता से कम नहीं था।
एक-एक पल को आखों में कैद करने को आतुर था
पहली बार में अपनी आखों से ये सबकुछ देख रहा था। ये मेरे लिए किसी अचम्भे से कम नहीं था। बरसात के दिनों में आकाश नीली-नीला नजर आ रहा था। उस दिन मौसम काफी सुहावना था। झंडोत्तोलन के बाद राष्ट्रगान हुआ। परेड का निरीझण खुली जीप में होते पहली बार देख रहा था। एक के बाद एक सारे कार्यक्रमों को देखा। वहां से हमलोग दस बजे के करीब निकले। लेकिन घर आते आते दिन के दो बज गए थे। 31 दिसंबर 1996 को दादाजी सेवानिवृत्त हो गए। लेकिन झंडोत्तोलन के प्रति उनका उत्साह आजीवन कम नहीं हुआ।
घर पर ही किया पहली बार झंडोत्तोलन
पहली बार घर पर ध्वजारोहण करने का निश्यय किया तो इस बात से वो बहुत खुश हुए। ऐसा पहली बार किया जा रहा था। इसी साल ये आदेश आया था कि कोई भी आदमी अपने घर या निजी प्रतिष्ठान पर झंडोत्तोलन कर सकता है। ये मेरे लिए ऐतिहासिक निर्णय था। चूंकि मैं पहली बार ऐसा करने जा रहा था। सभी आवश्यक तैयारियां पूरी हो चुकी थीं।बड़ी संख्या में आसपास के लोग उपस्थित थे। बहुत खुश था मैं उस दिन। फिर समय ने करवट बदली और मैं सिमट कर रह गया। समय की विडंबना देखिए जो कभी आयोजक की भूमिका होता था आज वह दर्शक बनकर के रह गया है। 22 फरवरी 2019 को दादाजी भी गुजर गए। आज मेरे पास कुछ है तो वो सिर्फ यादें है।
Monday, August 10, 2020
आसान नहीं है रविन्द्र कुमार वर्मा हो जाना
रविन्द्र कुमार वर्मा । यह नाम है एक ऐसे शख्स का जिसकी हंसी में कई राज होते हैं। बातों के अऩगिणत अर्थ होते हैं। बात 2019 की है। मैं सघर्षों के दौर में था। काम की तलाश कर रहा था। ऐसे में रविन्द्र वर्मा से पटना में मुलाकात हुई।इससे पहले मेरा कोई परिचय नहीं था। गजब का व्यक्तित्व ।बेमिसाल दायरा।आत्मीयतापूर्ण संबंध पहली मुलाकात से ही प्रगाढ़ होते चले गए। सिर्फ एक वाक्य कहा। काम करेंगे। स्वकृति में मैने सिर हिलाया। बस यही छोटा सा परिचय था हमारा। समय के साथ भाईचारा बढ़ा। और याराना भी। कभी मित्र की तरह अंतरंग बातें। कभी बड़े भाई की तरह सलाह ।कभी समझ ही नहीं पाया कि ये मित्र हैं या बड़े भाई। मैंने इनसे काफी सीखा। अखबार की बातें भी। निश्छल प्रेम करना भी। कातिल हसीं से मसले हल करना भी।शानों-शौकत रईसों जैसे। और रईस ठहरे भी।ऐस लगता है कि वर्षों पुराना याराना है।आज तक समझ नहीं आया। दोस्त कहूं या भाई साहब। या फिर गुरू।
खाने-पीने के हैं शौकीन
ये खाने-पीने के बहुत शौकीन आदमी हैं। घूमने के भी। यहां पर खाने-पीने के शब्दयुग्म को गंभीरता से मत लीजिएगा। भंवर में फंस जाएंगे। देसी और अंग्रेजी की क्या बात करें। पानी भी ठंड़ा नहीं पीते।इन्हें मोटा अनाज खाना बहुत पसंद है। तेल-मसाला से परहेज करते हैं ।लेकिन खाना बहुत लजीज पकाते हैं । लिट्टी-चोखा खाना पसंद करने वाले लोग।अगर एक बार इनके हाथ का बना खा ले। तो समझिए उसने अमृत चख लिया। मुझे दो बार यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इनका बनाया हुआ लिट्टी 72 घंटे तक खराब नहीं होता है। मैं इस बात का साझी हूं। विशुद्ध शाकाहारी हैं।प्याज- लहसून भी नहीं खाते हैं।आयुर्वेद पर पूरा विस्वास रखने वाले हमारे रविन्द्र भइया।मौका मिलने पर बाबा को कोसने से भी नहीं चूकते।
इनके यायावरी की चर्चा खूब होती है
एक बार ग्वालियर जाने का मौका इनके साथ मिला। वहां एक सेमिनार में भाग लेने हमलोग गए थे। सेमिनार का आयोजन विकास-संवाद और आईटीएम यूनिवर्सिटी के संयुक्त तत्वधान में हुआ था। मेरे लिए विचारों से परे यह कार्यक्रम था। पहली बार में इसमें सहभागी हो रहा था। रविन्द्र भइया से एक बार इस कार्यक्रम के बारे में चर्चा हुई थी। मैंने आग्रह किया कि मुझे भी साथ लेकर चलिए। तत्क्षण अपनी मौन स्वीकृति इन्होंने प्रदान कर दी। जैसै-जैसे समय नजदीक आता गया।मेरे अंदर उत्साह और उमंग का वेग हिलकोरे मारने लगा। ग्वालियर के लिए हमलोग बनारस से बुदेलखंड़ एक्सप्रेस पकड़ कर चल दिए। हमलोगों की एक छोटी सी टुकड़ी थी।जिसमें चार और लोग शामिल थे। हमारा सफर काफी सुहावाना और यादगार रहा। बातचीत का सिलसिला कभी नहीं रुका। किस्से- कहानी और हसीं ठिठोलियों का दौर कभी थमा नहीं। जीवन के कई अनछूए पहलुओं से मुखातिब होने का मौका मिला।मेरे लिए यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था। घूमने में मेरी अभिरुची हमेशा रही है। लेकिन पहली बार किसी ऐसे व्यक्ति के साथ घूम रहा था जो बहुत बड़ा यायावर था।नए-नए जगहों पर जाना। नए लोगों से मिलना।उनसे बातें करना।उनके विचारों को सुनना। उनके विस्वासों को जांचने- परखने में ये किसी घूमंतु भेटिये से कम नहीं है। इनके अंदर एक बुराई है। ये अपने अनुभवों को कलमबद्ध नहीं करते। अगर ये ऐसा करने लगे तो किसी खगोलिय घटना से कम नहीं होगा।
पैमानों से परे मित्रता
मित्रता के सम्बंध में खलील जिब्रान ने ठीक ही लिखा है कि मित्रता अवसर नहीं,बल्कि हमेशा एक मधुर उत्तरदायित्व है। सच्चे मित्र प्रतिदान की प्रत्याशा के बिना भी आपका रक्षा-कवच होते हैं । हम सब एक पंख वाले देवदूत हैं,मित्र हमारा दूसरा पंख होते हैं । मित्र हमारे भीतर से सर्वश्रेष्ठ का उत्खनन और निष्कर्षण करते हैं। वे हमारे सपनों को उड़ान देते हैं और हमारी कल्पनाओं को मुक्त आकाश । वे हमारे सपनों के संरक्षक होते हैं ।
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| avinash |
ख़लील जिब्रान की कही हुई एक एक बात अकाट्य सत्य की तरह मेरे व्यक्तिगत जीवन में साकार होता प्रतीत हो रहा है।आपसे निरंतर प्रेरित व अनुशासित होना मेरे लिए परमसौभाग्य की बात है।आपसे मेरा दूर दूर तक का कोई जान-पहचान नहीं था,लेकिन आपने जिस आत्मीयता से न केवल मुझे अपनाया किया बल्कि दीक्षित व प्रशिक्षित किया। वह मेरे लिए गौरव की बात है।
Thursday, August 6, 2020
पीएम मोदी ने पारिजात का पौध श्रीराम मंदिर परिसर में लगाया
- समुद्र मंथन के समय प्रकट हुआ था पारिजात का पौध, चौदह रत्नों में से एक था यह पौध
- श्रीकृष्ण ने इंद्र को युद्ध में पराजित कर पारिजात के दैवीय पौध लाए थे पृथ्वीलोक पर
5 अगस्त को पीएम मोदी एक दिवसीय दौरे पर अयोध्या गए थे। पीएम का अयोध्या दौरा बेहद खास था। इस दौरान लगातार मीडिया अयोध्या में उनके कार्यक्रम को कवर कर रहा था। सबसे पहले पीएम हनुमानकोट गए और वहां हनुमानजी की पूजा-अर्चना की। इसके बाद भगवान राम के मंदिर की आधारशिला रखने के लिए भूमि पूजन किए। इस अवसर पर भूमि पूजन करने से पहले राममंदिर परिसर में प्रधानमंत्री ने पारिजात का पौध लगाया। ये कोई सामान्य पौध नहीं है। यह दैवीय पौधा है जो समुद्र मंथन से प्रकट हुआ था। इस पर छोटे-छोटे आकार के सफेद फूल खिलते हैं। पारिजात के फूल अन्य फूलों से अलग होते हैं। ये फूल रात में खिलते हैं और सुबह झड़कर नीचे गिर जोते हैं।
धन की देवी लक्ष्मी को बेहद प्रिये हैं पारिजात के फूल
पारिजात के पौधे के बारे में पौराणिक कथा
इन्द्र को युद्ध में पराजित कर श्रीकृष्ण लाए थे पारिजात के पौधे को पृथ्वीलोक पर
औषधीय गुणों का भंड़ार है पारिजात के पौधे
पत्रकारिता 1
पत्रकारिता का जंतर-मं तR प्रेस विज्ञप्तियों का अपना मिजाज होता है अखबार के दफ्तरों में प्रेस ब्रीफिंग, प्रेस कॉन्फ्रेंस, प्रेस विज्ञप्ति बहु...
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पटना में इग्नू यानी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय का क्षेत्रीय केन्द्र मीठापुर में है। पहले यह गांधी मैदान के पास बिस्कोमान भवन...
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अविनाश मिश्रा। रेल मंत्रालय ने 2030 तक भारतीय रेल को पूरी तरह से हरित ऊर्जा से संचालित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है । ग्लोबल वार्मिंग और...
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ये है शाम्भवी विजय है।इनके साथ मेरा यही एक मात्र और दुर्लभ तस्वीर है।भाई समान मित्र @shubham के सौजन्य से यह तश्वीर गर्भगृह से बाहर निकल पाय...













