Tuesday, August 25, 2020

नेकी के सौदागर हैं सुजीत...

सुजीत कुमार। यही नाम है इनका। मेरे स्कूल के दिनों के मित्र हैं।आजकल भारत सरकार की महारत्न कम्पनी भेल में काम करते हैं। तश्वीर में बिटिया अद्विका और इनकी पत्नी हैं। भाभी जी कामकाजी महिला हैं और अस्पताल प्रबंधन में उच्च शिक्षा लेने के बाद हॉस्पिटल मैनेजमेंट का काम करती हैं। मेरे जीवन में इनका स्थान असाधारण है। ये बहुत अच्छे और गहरे मित्र हैं। 23 अगस्त को इनकी बिटिया अद्विका का जन्मदिन था। अद्विका का यह दूसरा जन्मदिन था। माता-पिता के लिए अपने बच्चों के जन्मदिन का विशेष उत्साह होता है। सुजीत के लिए भी यह मौका विशेष था। और विशेष हो क्यूं न भला। अद्विका इनदोनों की पहली संतान जो है।

अनाथालय में मनाया जन्मदिन

सार्वजनिक जीवन में सुजीत दिखावे से हमेशा ही दूर रहते हैं। अपनी बिटिया अद्विका का जन्मदिन चुपके से एक अनाथालय में मना लिए और किसी को इसकी भनक तक लगने नहीं दिया। ऐसे मौके पर मित्र सेे हमेशा भोजन की उम्मीद तो की ही जा सकती है। खैर, इस साल कोरोना की वजह से ऐसा संभव नहीं हो सका। लेकिन सुजीत के निर्णय ने मुझे झकझोर कर रख दिया। स्कूल के दिनों में भी ये सुलझे हुए फैसले लेने के कारण सबके प्रिय रहे हैं। मै व्यक्तिगत रुप से इनके निर्णय की प्रशंसा करता हूं।इसके लिए बिना भाभीजी के सहमति के ऐसा करना आसान नहीं था। इस नेक कार्य में भाभीजी ने अपना भरपूर सहयोग दिया। दोनों ने पहले ऑनलाइन माध्यम से एक अनाथालय को ढूंढ़ा। इनके घर से सेवा भारती का मातृछाया नामक अनाथालय निकट था। दोनों ने वहीं जाकर अपनी बिटिया अद्विका का जन्मदिन बिल्कुल साधारण तरीके से मनाया। कोई आडंबर नहीं किया। किसी जमघट का माहौल नहीं बनाया। मातृछाया के केयर-टेकर ने इस दौरान विशेष सावधानी बरतने का निर्देश दिया था। जिसका अनुपालन दोनों ने किया। अनाथालय के बच्चों को दोपहर के भोजन के लिए एक निश्चित राशि का दान मातृछाया अनाथालय प्रबंधक को दिया। 

पुराने दोस्तों में से एक हैं सुजीत

सुजीत और मैं हाईस्कूल में मिले थे। सीधे मेरा नामांकन नौवी कक्षा में काराया गया था। हाईस्कूल मेरे घर से काफी दूर था। इसलिए एक पुरानी साईकिल स्कूल जाने-आने के लिए मिला था। उसी से मैं स्कूल जाता-आता था। मै काफी डरा-सहमा हुआ रहता था। ये परेशानी आज भी मेरे साथ है।पहली बार घर से इतनी दूर जाने के लिए घरवाले भेज रहे थे। नामांकन के बाद पहली बार मै स्कूल गया। तो किसी ने आगे की पंक्तियों में बैठने नहीं दिया। उसदिन मै पीछे से दूसरे नबंर की पंक्ति में बैठा था। स्कूल का पहला दिन मेरे लिए किसी सदमें से कम नहीं था। मेरे सपने कोसी के तटबंध की तरह रिसने लगे थे। मै हताश और निराश था। स्कूल छोड़ भी नहीं सकता था। दूसरे स्कूल में नांमाकन के लिए बोलना किसी जघन्य अपराध की सजा भुगतने जैसा भयानक अनुभव देने वाला था।इसलिए चुप रहना ही बेहतर समझा। कक्षा में दूसरे दिन आगे से तीसरी पंक्ति में बैठने का मौका मिला। और एक दिन उसी पंक्ति में सुजीत मुझे मिले। समय के साथ हमारी मित्रता प्रगाढ़ होती चली गई। 


Thursday, August 20, 2020

अजमेर और पुष्कर की मेरी यात्रा.....

यह यात्रा उन दिनों की है जब मैं सरकारी नौकरी के लिए इधर-उधर भटक रहा था। इसी क्रम में मुझे अजमेर और पुष्कर जाने का मौका मिला। इससे पहले कभी राजस्थान नहीं गया था। यह मेरी पहली यात्रा थी। राजस्थान के भौगोलिक परिवेश से बिल्कुल अनभिज्ञ था। लेकिन यात्रा की ललक अपने चरम पर थी। मेरे एक मित्र ने बताया कि हाजीपुर के रास्ते गरीब-नवाज एक्सप्रेस अजमेर जाती है। फिर क्या था। टिकट कराया और निर्धारित तिथि को गरीब-नवाज एक्सप्रेस से अजमेर के लिए निकल गया। वहां जाने के पीछे कारण स्टेट बैंक की सहयोगी एसबीबीजे यानी स्टेट बैंक बीकानेर एंड जयपुर के लिए टेस्ट परीक्षा देना था। मेरी ट्रेन निर्धारित समय से कुछ विलंब चल रही थी। ट्रेन पकड़ने के अगले दिन शाम के छह बजे के करीब अजमेर जंक्शन पहुंचे।

सस्ती और सुलभ ठिकाने की तलाश  

अजमेर स्टेशन पर उतरने के बाद सस्ते और सुलभ ठिकाने की खोज में भटकने लगा। चूंकि मैं विद्यार्थी । मेरे पास इतने पैसे नहीं थे जिससे औसत दर्जे का होटल या गेस्ट हाउस ले सकता था। कई छोटे-मोटे होटलों में गया तो उसका भाड़ा जेब पर भारी पर रहा था। इसलिए ठहरने के लिए धर्मशाला की तलाश करना ही बेहतर समझा। इस दौरान कई उच्कों से भेंट- मुलाकात हुई जो शिकार की तलाश में भंवरे की तरह स्टेशन परिसर में मडंरा रहे थे। स्टेशन परिसर से बाहर निकलने के बाद एक दवा दुकानदार से धर्मशाला के बारे में पूछा। दुकानदार ने एक हिंदू धर्मशाला का पता बताया। उस दुकानदार ने कहा कि यह धर्मशाला पास में ही पृथ्वीराज मार्ग पर है। रात के नौ बजने वाले थे। ढूंढते-ढूंढते धर्मशाला के गेट पर आ धमके। तबतक काफी थक चुके थे। अपना रूम बुक कराया। थोड़ा सुस्ताने के बाद कुछ खाने के लिए बाहर निकला। पेट में चूहे फर्राटा दौड़ की तरह उधम मचाए हुए थे। उस रात प्याजीपूरी खाकर भूख मिटाया। अगले दिन किताबें पलटते रहे। 

आना सागर झील

मैंने परीक्षा केन्द्र जाने के क्रम में देखा कि बहुत सारे लोग एक विशाल जलकुंड के पास खड़े होकर चहलकदमी कर रहे थे। वहां बड़ी-बड़ी गाड़ियां खड़ी थी। रेहड़ी वालों की दुकानें लगी हुई थी।ये मेरे लिए किसी अचंभे से कम नहीं था। पहली बार झील अपनी आखों से देख रहा था। बाद में मालूम चला कि उसका नाम आनासागर झील है। मालूम हो कि आनासागर झील का निर्माण पृथ्वीराज चौहान के पितामह आनाजी चौहान ने पारहवीं शताब्दी के मध्य में करवाया था। आनाजी ने इसका निर्माण काराया था इसलिए इसका नाम आनासागर झील पड़ा।

अजमेरशरीफ और ढाई दिन का झोपड़ा

अगले दिन सुबह छह बजे के करीब सूफीसंत मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के लिए निकले। ख्वाजा गरीब-नवाज की दरगाह ज्यादा दूरी पर नहीं था। निजाम गेट से दरगाह के अंदर प्रवेश किया। मेरे पास कोई समान नहीं था। सिर्फ एक छड़ी जिसके सहारे मैं चलता था। दरगाह सुबह-सुबह पहुंच गए थे। लोगों की भीड़ थोड़ी कम थी। एक खादिम ने वहां कि रसमें पूरी कराई। ढा़ई दिन का झोपड़ा- दरगाह से बाहर निकलकर एक चाय की दुकान पर गया। वहां चाय पीया। दुकान पर टीवी लगी थी। ढ़ाई के झोपड़ा के बारे में बताया जा रहा था। दुकानदार से ढ़ाई दिन के झोपड़ा जाने का रास्ता पूछा। धूप काफी तीखी हो चली थी। ढ़ाई दिन का झोपड़ा काफी उंचाई पर है। इसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने कराया था। कहा जाता है कि इसका निर्माण ढ़ाई में कराया गया था। इसलिए इसका नाम ढाई दिन का झोपड़ा रखा गया। बता दें कि यह कोई झोपड़ा नहीं है बल्कि एक मस्जिद है।इसके बारे में अलग- अलग कई कहानियां सुनने को मिल जाती है।

पुष्कर मंदिर में पूजापाठ 

उसी दिन पुष्कर के लिए दो बजे बस से निकले। पहली बार पहाड़ी रास्तों से सफर कर रहा था। बस स्टॉप से उतरने के बाद ऑटो मंदिर जाने के लिए लिया। महाभारत में पुष्कर राज के बारे में लिखा है कि तीनों लोकों में मृत्युलोक महान है। और मृत्युलोक में देवताओं का सबसे प्रिय स्थान पुष्कार राज दुर्भाग्य से पुष्कर सरोवर में स्नान नहीं कर पाया। देह पर जल छिड़कर ब्रह्मा मंदिर में पूजा अर्चना किया। रास्ता दुर्गम होने को कारण जल्दी निकल लिये। चूंकि आठ बजे मुझे दिल्ली के लिए निकलना था। इस तरह मेरी अजमेर और पुष्कर की यात्रा मंगलमय पूरी हुई।


Monday, August 17, 2020

माल फूंकने पर ही होता था ज्ञान का प्रवाह

माल फूंककर ज्ञान वाचने की कला में सिद्धस्त होना भी छात्र जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू होता है।और जो लड़का इस गुण में परांगत होता है वह कुछ ही दिनों में सबका चहेता बन जाता है।आज मैं जिस लड़के का उल्लेख कर रहा हूं उसके विचारों की गहराई को कभी नाप नहीं पाया। हालांकि की #BHU हॉस्टल में वह मेरा रूप पार्टनर था। हमदोनों एक दूसरे का बहुत सम्मान करते हैं।वो मेरे लिए श्रीकृष्ण जैसा है।पूरे शैक्षणिक सत्र के दौरान मेरे रूम पार्टनर सौरभ यादव ने मेरा भरपूर साथ दिया।  

सौरभ इलाहाबाद के पास झुसी के रहने वाले  यादव कूल शिरोमणि हैं और मैं बिहार के वैशाली का रहने वाला एक निरीह सुदामा।इलाहाबाद के जिस स्कूल में अमिताभ बच्चन की शुरुआती पढ़ाई हुई है  उसी से सौरभ ने स्कूली पढ़ाई पूरी की।उसके जीवन में कई बार ऐसे मौके आए जब देश के शीर्षस्थ संस्थानों से नामांकन के लिए  बुलावा आया लेकिन इस लड़के ने सबको एक के बाद एक ठुकरा दिया।शायद उसका नामांकन दूसरे संस्थानों में हो जाता तो मैं बनारस की फक्कड़ी को  नजदीक से अनुभव नहीं कर पाता।

मैं सौरभ के तर्कशक्ति और घुमक्कड़ी का कायल हूँ। एक ही रूम में साथ रहने के बावजूद मैं इसके कौशल को परख नहीं पाया। मैं व्यक्तिगत रूप से इसके विचारों का सम्मान करता हूं। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में किसी को हाथ पैर तुड़वाने का काम हो ।किसी लड़के को धमकाने का कार्य करना हो।किसी को कंबल ओढना हो ...कंबल ओढ़ाने का तात्पर्य समझते ही हैं आप। या फिर किसी नाचीज़ को अपने बुलेट पर घुमाना हो ....इन सारे कार्यों में इस लड़के को महारत हासिल है।

इनसब से अलग इस लड़के को एक और मामले में महारत हासिल था।यह उच्च कोटि का प्रवचनकर्ता करता है।सभी बच्चे इसके मुखारविंद से ज्ञान का श्रवण करते थे  । रात दस बजने का इंतजार हॉस्टल के कई लड़के किया करते थे।रात के दस बजने के बाद जब हॉस्टल अटेंडेंट रूम चेक करके चले जाते थे तब लड़कों का दरवाजा पीटना शुरू होता था।

दस बजने के बाद शुरू होता था ज्ञान का वाचन। असली वाला ज्ञान । ऐसा ज्ञान जिसकी प्राप्ति बहुत ही दुर्लभ होता है। हरेक प्रवचन करता अपने पूरे मनोयोग से वाचन करता है।जहां कोई बन्धन नहीं होता। सभी के विचारों को गंभीरता से सुना जाता है। भले उसपर अमल ना हो। विचारधाराओं का कोई टकराव नहीं होता। तहखाने में परे राज एक के बाद एक खुलते हैं। भविष्य की योजनाएं बनाई जाती है। और जहाँ लड़कों के रोने पर कोई हँसता नहीं है। बल्कि गंभीरता से उसकी बातों को सुनते हैं। और झूठी सांत्वना देते हैं। विद्यार्थियों के सत्संग के ऐसे ही विषय होते थे।

वैदिक सत्संग की तरह  यह भी तीन से चार घंटो  का कार्यक्रम होता है। बीयर से शुरू होने वाला यह कार्यक्रम माल फूंकने तक चलता था। प्रवचन का स्तर ब्रांड पर निर्भर करता था। Bacardi  , Johnny walker , teacher's. , Blender pride , Jack Daniels जैसे ब्रांड मुख्य होते थे। इससे समझिए ज्ञान का  प्रवाह कैसा  होता था। कभी कभी वोदका और ब्रिज़र से भी लोग काम चलाते थे। अमूमन ऐसा कम ही होता था।जब तक खत्म नहीं हो जाता प्रवचन की अविरल धारा बहती  रहती थी।

जैसे जैसे बोतल खुलता...जॉन आलिया, फैज़, बशीर बद्र, मिंटो एक साथ देखने और सुनने को मिलते। रोज यह कार्यक्रम तीन से चार घण्टे चलता था।
मैंने अपने जीवन में ऐसा फक्कड़ आदमी कभी नहीं देखा।विंध्याचल और बनारस की तंग गलियों में टॉप की स्पीड  के साथ मुझे राइड पर ले जाता था। बनारस में  अस्सी घाट पर रात में बैठकर ठंडी हवा का आनंद मैंने इसी लड़के के साथ लिया। सौरभ बेजोड़ इंसान हैं और इनके साथ  बिताया गया हरेक पल मेरे लिए अविस्मरणीय।
नोट:-  सौरभ के साथ रहने पर पहली बार मालूम हुआ कि लडकियां भी लड़कों को छेड़ती हैं। एक दिन की बात है  । एक लड़की अचानक से बीमार हो गई।इस कारण कई दिनों से वह क्लास करने नहीं आ रही थी। लड़कों के लिए यह गम्भीर मसला था। कैंपस में उसके बीमार होने की चर्चा सुर्खियां बटोर रही थी। सौरभ ने किसी से उसका हाल पूछ लिया। यह खबर मन की गति से उसके पास पहुँच गई। उसने कहा अगर मेरी इतनी ही चिंता है तो एक बुके भेज देते।अगले दिन सुबह ताज़े ताज़े गुलाब का बुके उसके पास हाजिर था।
ऐसे अनगिनत खिस्से -कहानियां है जिसका मैं साक्षी हूँ।लड़कियों की बात कौन करता है ।मैडम भी कतार में थीं।भाई का जलवा था।चचा जो विधायक थे।आज जब दुनिया समाप्त होने की कगार पर है। बीते हुए पल जेहन में तरोताज़ा हो रहे हैं

युद्धविराम के साथ शांतिप्रस्ताव

ये है शाम्भवी विजय है।इनके साथ मेरा यही एक मात्र और दुर्लभ तस्वीर है।भाई समान मित्र @shubham के सौजन्य से यह तश्वीर गर्भगृह से बाहर निकल पाया।इसके लिए शुभम को ढेरो बधाई ।
शाम्भवी आजकल एक पब्लिशिंग हाउस के लिए काम कर रही है।अंग्रेजी साहित्य के प्रति इनका विशेष रुझान है।शाम्भवी अंग्रेजी साहित्य की विदुषी हैं।अंग्रेजी भाषा पर इनकी मजबूत पकड़ इनके प्रतिभा में चार चांद लगाता है।साहित्य के प्रति इनकी अभिरुचि प्रंशसनीय है।शाम्भवी बहुत ज्ञानी हैं। अपनी बातों और विचारों को ढंग से रखती हैं। ये काफी मजबूत और जिंदादिल इंसान हैं।

हमदोनों के बीच विचारधाराओं की लड़ाई कभी नहीं हुई।एक बार की बात है। इन्होंने मुझसे कहा कि मैं क्लास में काफी संजीदा रहता हूं।जबकि हॉस्टल में खूब मस्ती करता हूं।मुझे नहीं मालूम कि किस आधार पर इन्होंने ऐसा कहा था। लेकिन यह मुझ पर लगाया गया एक मिथ्या आरोप था।उसके बाद मैं थोड़ा परेशान सा रहने लगा था।आप उसे मानसिक अवसाद से ग्रसित होना भी बोल सकते हैं  । तब इससे उबरने में sunny जो क्लीनिकल मनोविज्ञान की पढ़ाई करता था। उसने काफी मदद की थी।

BHU के शुरुआती दिनों में थोड़ी बहुत दोस्ती थी ।आजकल नहीं है।मुझे मनमुटाव की वजह मालूम नहीं।और कभी पता करने के लिए कोशिश भी नहीं किया।हमदोनों ने एक दूसरे की बातों को कभी नहीं काटा।हमदोनों की बातचीत हमेशा ससम्मान होती थी।कुछ दिनों पहले शुभम ने जब यह तस्वीर ग्रुप में डाले तो पुराने दिनों की तश्वीर आँखों के सामने तैरने लगे।bhu में पहली बार जीवन में हमने एक मित्र को खोया था।आज जब सब अपने अपने क्षेत्रों में उधम मचा रहे हैं। मैं इनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं।

मेस महाराज जी के लड़के सर्वेश की शादी

अविनाश मिश्रा। ये हैं सर्वेश । इनका पूरा नाम सर्वेश कुमार गोंड हैं।
BHU के दक्षिणी परिसर में पढ़ने वाले लड़के और सिर्फ लड़के इनसे भलीभांति परिचित होंगे।हालांकि लड़कियों के इलाके में मशहूर होने के लिए ये कॉमन जिम सेंटर लगातार जाते रहे हैं लेकिन आगे का पता नहीं।हमारे महाराज जी के लड़के हैं।आज इनकी शादी हो रही है ।लॉकडाउन के कारण दिन में ही बनारस के पास इनकी शादी हो रही है। जब मैं यह पोस्ट लिखा रहा था उसी समय में ये विवाह सम्बंधी वैदिक कार्यक्रम सम्पन्न करने में लगे हुए हैं। सर्वेश और इसके सभी भाई मेहनतकश इंसान है। 
इनके जीवन में एक समय ऐसा भी था जब ये घोर आर्थिक संकटों से जूझ रहे थे। इससे उबरने के लिए ये गाँव से अपने पिता के पास  BHU के दक्षिणी परिसर आ गए। इनके पिताजी जिन्हें हमलोग महाराज जी बोलकर पुकारते थे, वो बहुत ही नेक दिल इंसान थे।लेकिन आज वो हमलोगों के बीच नहीं हैं ।पिछले वर्ष अर्थात 2019 मार्च में उनका देहांत हो गया। वो लंबे समय से बीमार चल रहे थे।जब हमलोग वहां पढ़ रहे थे तभी हॉस्टल के मेस में उनका आना- जाना कम होने लगा था।लेकिन जब भी मिलते एक अभिभावक की तरह मिलते। उनका सीधा प्रश्न होता...कैसे है भइया।  अमूमन जैसा BHU की परंपरा है। वहां कार्यरत एक चतुर्थवर्गीय कर्मी से विभागाध्यक्ष तक सभी #महामना के सपनों को आकार देने में लगे रहते हैं।महाराज की भूमिका व योगदान महती थी।
महाराज जी शास्त्र और शास्त्रीयता से बिल्कुल अनभिज्ञ थे। लेकिन चेहरा पढ़ने की कला में उनके बराबरी का वहां कोई दूसरा नहीं था। महीनों बिना पैसे के खिलाते। मुझसे कभी पैसा नहीं मांगा। लेकिन घर से जैसे ही पैसा आता उन्हें पहले मैं दे देता। हरेक बच्चे का पूरा ध्यान रखते। जो बच्चा खाना खाने नहीं आता तो उसके रूम में खाने के बारे में जाकर पूछते।ऐसे नेक पिता के पुत्र हैं सर्वेश। आज ये भी सभी भाइयों के साथ मिलकर मेस चला रहे हैं। जब भी कोई घूमने जाता है तो आज भी उन्हीं के मेस में खाना खाता है। और सर्वेश कभी पैसे नहीं मांगता।सर्वेश और हमारा आत्मीयतापूर्ण सम्बंध था। जो आज भी चला आ रहा है।आज इसकी शादी है। इसे आप सब अपना शुभाशीष दीजिए।

और कितनी निर्भया.....

जब  देश ने बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा दिया था...तब किसी ने सोच भी नहीं होगा कि ....इस देश में बचेंगी बेटियां तभी तो पढ़ेंगी बेटियां...
लेकिन हम उनकी आवाज़ बनने के अलावे... कर भी क्या सकते हैं.....पुकारे भी तो किसे पुकारे..... यह देश तो द्रोपदी और अहल्या का भी उतना ही था..... जितना कि हमारा और आपका.....
क्या हुआ था अहल्या के साथ.....आखिर क्या दोष था द्रुपद कन्या का..... कुछ याद है आपको.....या भुला दिए उसे .....
मैं उसी अहल्या की बात कर रहा हूं..... जिसका उद्धार राम ने किया था.....एक मर्द (इंद्र ने)ने उसके साथ छल किया और दूसरे मर्द (उसके पति गौतम ऋषि) ने उसे दंड दिया था...
द्रोपदी के साथ क्या हुआ था...उसने तो विरोध किया था...पुरजोर विरोध किया था...वह सभा में ख़ूब चीखी और चिल्लाई भी थी.....उस सभा में सभी तो थे.....सबके सब अपने ही थे...कोई पिता का मित्र था... तो किसी की वह पुत्रवधू  थी ... किसी की पत्नी....
महाबली भीष्म.... आचार्य द्रोण....कृपाचार्य... वहीं पर आपने हाथों को बांधे खड़े थे .....द्रुपद कन्या के पांचों पति......न्यायप्रिय युधिष्ठिर..... परम् बलशाली भीम... सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन.....तेजश्वी नकुल और सहदेव...
जब सभासदों ने द्रौपदी की चीख...पुकार को अनसुनी कर दिया ....फिर आज हम किसी से कैसे उम्मीद कर सकते हैं  ....कि वह नारी सम्मान में एक बार फ़िर से धर्मक्षेत्र में शंखनाद करेगा....
हम जागने के लिये अपनी बारी आने का इंतज़ार जो कर रहे हैं...विड़बना तो दिखिये.....अगर कोई किसान पराली जलाये तो तुरंत एफआईआर..... और साथ ही साथ सरकारी अनुदाननों से तीन साल तक वंचित होने का उपहार अलग से मिलता है...
तो साहब जरा ये भी लगे हाथ बता दीजिए ....जब कोई बेटी जलाये तब....समय से न्याय क्यूं नहीं मिलता...न्याय के लिये क्यूं पड़ता है भटकना...
अगर अपराध जघन्य है तो सजा भी कठोर मिलनी चाहिए.....इंडोनेशिया में बलात्कारी को नपुंसक बना दिया जाता है..... जीवन भर वह महसूस करे कि दर्द का अनुभव कैसा होता है..... इसलिये उसके अंदर महिलाओं के हार्मोन डाले जाते हैं...
और हम न्याय के लिए जंग लड़ते रहते हैं।
और इंतजार करते हैं अगली बार फिर कहां..... घटनाएं रोज हो रही है.... बस सुर्खियां नहीं बन पाती....
दुनिया बदलने से बेहतर है ....हम अपने नजरिए में बदलाव करें...फिर कोई अहल्या... कोई द्रोपदी... कोई निर्भया किसी दम्भी मर्द का शिकार न बन सके.....
अब गोविंद बचाने नहीं आएंगे .....
दुर्गा और चंडी का रूप धारण करना ही होगा
तुझे अपनी लड़ाई खुद ही लड़ना होगा। 

विरले इंसान ही आप दीपो भवः को चरितार्थ कर पाते हैं

अविनाश। आज बुद्ध पूर्णिमा है। भगवान बुद्ध ने अपना प्रकाश स्वयं बनने की सीख दी है।इस दिन का विशेष महत्व है।यह दिन स्वयं को टटोलने का अवसर देता है।यह सीख देता है कि कैसे उद्दात भाव और शांत चित्त मन से अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।
मैं आज अपने पोस्ट में एक ऐसे लड़के का उल्लेख कर रहा हूं जिसकी तश्वीर देखकर ही आपको मालूम हो जाएगा कि वह कितना शांतचित्त भाव का है।उसके लिए राष्ट्र प्रथम है और जिसे अपने हिन्दू होने पर गर्व है। आध्यात्मिक ज्ञान और चेतना के लिए जो श्री श्री रविशंकर से प्रेरणा लेता है।वह श्री श्री का एक कट्टर समर्थक है।
निःसंदेह दिखने में वह बंगालियों जैसा लगता है ।लेकिन वह विशुद्ध बिहारी है।नई नई भाषाओं को तेजी से सीखने की कला में उसे महारत हासिल है।अपने इन्हीं गुण के कारण बंगाल के नवोदित हिंदी के पत्रकार के बीच उसकी गहरी पैठ है।
कोलकाता से उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले उस स्वयंभू गुरु का नाम उज्ज्वल है। हॉस्टल में कुछ लड़के गुरुजी के नाम से भी इसे पुकारते थे।कोलकाता में अपने अल्पकालिक प्रवास के दौरान इसने बड़ी तेजी से बंगाल भाषा सीखकर बंगालियों को खूब झकया।
स्वभावगत यायावर प्रवृत्ति का होने से एक स्थान पर यह बंधकर नहीं रहता । बिहार, रांची, कोलकाता ,बनारस होते हुए आजकल यह राष्ट्रीय राजधानी में विचर रहा है।
बंगालियों में एकता की जड़ें काफी मजबूत होती है।इसलिए शायद वहीं पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बीज अंकुरित हुई थी।ये लड़का इसका बहुत बड़ा उदाहरण है।पूरे सत्र के दौरान जिस बाला को केंद्र बना कर पूरा कैंपस घूम रहा था। अगर गणितीय भाषा में कहें तो जो लड़की अपने धुरी पर मनचले लड़कों को घुमा रही थी। उसे देखते हुए इसने कहा कि यह बंगाली है।होली के मौके पर जब दोनों का आमना सामना हुआ तो उज्ज्वल सच साबित हुआ।वह बंगाली ही थी। और उज्ज्वल उसके स्कूल का ही लड़का निकला।
समय का कुचक्र दिखिये । पटरियां बिछनी शुरू ही हुई थी कि गाड़ी डिरेल हो गई।उज्ज्वल इंटर्नशिप करने के लिए दिल्ली चला गया।उसके बाद गाड़ी कोई और हांक कर ले गया।लेकिन इतेफाक से दोनों एक बार फिर कोलकाता में मिले।बेचारे ये अकेले और वो किसी के संग थी।
नोट:- बहुत कम लोगों को पता है कि यह दोहरे चरित्र का व्यक्ति है।इस बात को अन्यथा नहीं लीजिएगा।मेरे कहने का आशय यह है कि क्लास में जब कुछ सीखने या बोलने की बारी होती थी तब यह बहुत ही संजीदा होकर बोलता और सुनता था वहीं जब दोस्तों की झुंड में होता तब मस्तीखोर बन जाता था। दोस्तों के साथ अश्लील बातें करता और अश्लीलता से भरे हुए हरकतें करता था।समझिए कि मस्ती करने के मामले में बेजोड़ इंसान है।मेरी कुछ तश्वीर इसके पास है जिसे आधार बना कर ये मुझे डराता रहता है।इस बात पर बहुत ही गौरान्वित महसूस करता है। और गर्व से कहता है कि हरेक इंसान को दोहरे चरित्र का होना चाहिए।जब कुछ सीखना हो तब संजीदा और जब दोस्तों के साथ रहे तब मस्ती। इसलिए कभी कभी हमलोग इसे मस्तीखोर भी कहते थे।
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अपना एक बेहतरीन साल देने के लिए धन्यवाद" हिंदुस्तान"

अविनाश मिश्रा । 30 मई 2019 के दिन शाम के तीन बज रहे थे और मोदी के दूसरे कार्यकाल का शपथ समारोह टीवी पर प्रसारित हो रहा था । वहीं दूसरी तरफ हिंदुस्तान , पटना के लिए मेरा टेस्ट लिया जा रहा था।

- मेरे मन के अंदर तमाम तरह की दुविधाएं आकर ले रहीं थी । एक के बाद एक असफलताओं का स्वाद चखने के बाद मन की गति मैराथन की रफ्तार से दौड़ रही थी। मैं काफी डरा व सहमा हुआ सा था।
- मेर अंदर साहस व आत्मविश्वास भरने के लिए शशिकांत द्विवेदी सर का बहुत बहुत आभार। सर आप मुझे अपने पास मुजफ्फरपुर हीं बुला रहे थे। लेकिन मैं वहां रहने में असमर्थ था। मैं एक धुरी से बंधा हुआ हूं। मेरी परिधि निश्चित है। मैं उस परिधि के बाहर जाने की कभी सोच भी नहीं सकता। फिर भी आप अपना प्यार मार्गदर्शन बनाएं रखियेगा।
- मुजफ्फरपुर जाने की असमर्थता एक बार फिर मुझे पटना खिंच ले आई। इस बार शशिकांत सर के निर्देश में आगे बढ़ रहा था। मेरे लिए उन्होंने नींव तैयार करने का काम किया। इनके परामर्शानुसार ही पटना में दीपक दक्ष सर से मिला। शायद उस दिन दीपक सर के पास समय की किल्लत थी। इसलिए वो ज्यादा समय मुझे नहीं दे पाएं। सिर्फ अपना नंबर दिए और बोले कि फोन करना। इसके बाद मैं घर लौट आया।
- लगभग अप्रैल महीने के मध्य में हिंदुस्तान का स्मार्ट लंच होने वाला था। सभी लोग उसी में व्यस्त थे।इस नई शुरुआत के लिए लोगों के मन में गजब का उत्साह देखने को मिला। ऑफिस में मिलने पर दीपक सर एक नम्बर दिए और बोले कि ये रविन्द्र वर्मा का नंबर है।इनसे बात करके मिल लीजिए।संकोची मन से मैंने उनसे पूछा कि इन्हें कैसे पहचानेंगे।इस प्रश्न के जवाब में उन्होंने बिल्कुल छोटा सा उत्तर दिया। उनको सब जानता है।इसके आगे वो कुछ नहीं बोले।मैंने भी निःशब्दता का आर ले लिया ।इसके बाद दीपक सर मुझे नीचे से पटना लाइव के कार्यालय तक लेकर गए।
- इसके बाद जीवन में आया असली मोड़।यहां मुलाकात हुई सदाबहार व्यक्तित्व के धनी इंसान रविन्द्र वर्मा से।
उनके अभिवादन में मैंने उन्हें - भइया नमस्ते बोला (आज भी मैं मिलने पर यही बोलता हूँ )।
इसके जवाब में उन्होंने बोला- नमस्ते (आज भी वो यही बोलते हैं ) । इसके बाद शुरू हुआ सीखने का दौर।
- पिछले एक साल से रविन्द्र भइया को जानता हूं। उनका प्रभाव मेरे जीवन पर गहरा पड़ा है । आज वो मेरे जीवन में मित्र...गुरु...और मार्गदर्शक का स्थान रखते हैं।जितना प्यार व स्नेह उनसे मिलता है मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर मेरा सहोदर बड़ा भाई होता तो नहीं मिलता।
-इसके बाद मिला शंकर जी से। शंकर अर्थात सबका कल्याण करने वाला। अपने नाम के अनुरूप ही कर्म करने वाले इस युवा पत्रकार से बहुत प्रभावित हूँ।किसी भी परिस्थिति के लिए हमेशा तैयार रहने वाला यह इंसान मुझे अपना मित्र और भाई मानता है।यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है।इसके लिए मैं उनका आभार व्यक्त करता हूँ ।इनके पास हाजमोला का भंडार है। सर्वथा सबके लिए सुलभ व उपलब्ध।
- वहां कार्यरत सभी से कुछ न कुछ सीखने को मिला। सबने अपने हिस्से का ज्ञान व मार्गदर्शन मुझे दिया।सबका बहुत बहुत आभार।
- 1 जून 2019 को हिंदुस्तान प्रादेशिक टीम का हिस्सा बना। लगभग एक सप्ताह तक वहां जाता बैठता और काम करते हुए देखता और सीखता रहा।
-मुझे पहला मौका सीवान एडिशन में तत्कालीन संपादक सर के कहने पर मिला। पहला पेज सीवान का पाँच नम्बर मिला। इस एडिशन की प्रभारी आरती जी थीं। क्लास रूम पत्रकारिता में जो सिखाया गया था उसी के अनुरूप उनका व्यक्तित्व निडर व निर्भीक है। विरले लोग होते हैं जिनके अंदर सच बोलने का साहस होता है।मैं पूरे विश्वास के साथ बोल सकता हूं कि सच बोलने के पैमाने पर ये हमेशा खड़ी उतरती हैं।
- एक समय की बात है। मैं बिल्कुल नौसिखिया था। धीरे धीरे काम करता था। एक प्रभारी महोदय इसकी शिकायत कर दिए। लेकिन हिंदुस्तान के प्रादेशिक टीम में सिर्फ आरती जी पूरे आत्मविश्वास के साथ मेरे पक्ष में बोलीं। इनके साहसिकता के अनुभव ने मुझे बेहद प्रभावित किया।
- वैसे तो वहां काम करते हुए मुझे एक साल गए। मुझे सबसे कुछ न कुछ सीखने को मिला है। मैं सबका बहुत बहुत आभार व्यक्त करता हूं।विशेषकर हमारे इंचार्ज सुनील सर , सतेंद्र सर,शैलेंद्र भइया, दिलीप भइया, अजय भइया, विजय सर, नवल सर,अनिल भइया, मिंटू सर, रितेश भइया, राजू सर,प्रह्लाद सर, नितेश भइया, मनीष जी, अंजली जी, अश्मनी , सविता मैम और हमारे जुनैद सर....आप सबका बहुत बहुत आभार।आलोक भइया से बहुत कुछ सीखा और सिख भी रहा हूं।एक इंसान हरपल कैसे आनन्दित रह सकता है इसे इनसे बेहतर कोई और नहीं सीखा सकता।
- मुझे झेलने के लिए हिंदुस्तान पटना के टीम का बहुत बहुत धन्यवाद। 1 जून 2020 को हिंदुस्तान पटना के प्रादेशिक टीम का हिस्सा बने एक साल बीत गए।अब तक का सफर अच्छा रहा।आपलोगों का प्यार, स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहे ....बस यही शुभेच्छा है।आप सबको ढेरों बधाई व अभिनंदन एक बेहतरीन साल देने के लिए।
मुझे मौका देने के लिए सबका बहुत बहुत आभार व धन्यवाद।
आपका अविनाश मिश्रा
रहे न रहे हम
महका करेंगे
बनके कली बनके हवा...

Saturday, August 15, 2020

यादें- एक सुनहरे पल की.....

देश आजादी के 74 वें जश्न को मनाने में डूबा हुआ है और मैं अपने कमरे में बैठकर अतीत को निहार रहा हूं।दादाजी को गुजरे हुए एक साल से ज्यादा का समय बीत गया। इस दौरान काफी कुछ बदल गया। मेरे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में काफी उथल-पुथल मच चुका है। अगर मेरे पास कुछ बचा है तो सिर्फ यादें.....। और सिर्फ यादें। अगस्त का महीना आते ही स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों में समूचा राष्ट्र जुट जाता है। कार्यक्रमों की रुपरेखा तैयार होने लगती है। एक सरकारी कर्मी होने के नाते मेरे दादाजी बढ़-चढ़कर स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों में शामिल होते थे। 

अक्षयवटराय स्टेडियम में होता है मुख्य आयोजन

वैशाली जिले में मुख्य आयोजन कचहरी मैदान में होता है। अब इस कचहरी मैदान को अक्षयवटराय स्टेडियम के नाम से भी जाना जाता है। आज भी यह मैदान  गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के लिए मुख्य आयोजन स्थल है।26 जनवरी और 15 अगस्त के मौके पर दादाजी तड़के सुबह जाग जाते और ऑफिस जाने की तैयारियों में जुट जाते थे। उस समय मेरे घर में अलार्म वाली घड़ी नहीं थी। रात में सोने के बाद जब भी नींद खुले उसके बाद सोते नहीं थे। सुबह के चार बजे तक सभी लोगों को जाग जाना है। ये नियम सबके ऊपर मेरे घर में लागू था।वो कचहरी जाने की तैयारियों में जुट जाते। घर के लोगों की भूमिका सहायक की होती थी। जब मैं छोटा था तो हर साल साथ चलने की जिद्द करता था। मुझे आज भी याद है वो बोलते कि अगले बार साथ लेकर चलेंगे। ये सिलसिला कई बरसों तक चलता रहा। आखिर में वो साल भी आया जब स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उनके साथ जाने का अवसर मिला। गणतंत्र दिवस के मौके पर ठंड़ के कारण कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया। घर से हम लोग साईकिल से निकले थे। उस समय सुबह के छह बज होंगे। उस समय कचहरी में साईकिल रखने के लिए कोई स्टैंड नहीं था। दादाजी ने अपनी साइकिल एक चाय की दुकान पर लगाया। वहां पहुंचते ही चायवाले दादाजी को चाय की गलास थमा दिये। और मुझे बिस्कुट खाने को दिया जबकि मेरा भी मन चाय पीने को था। ये बाद में मुझे पता चला कि वो चाय वाला मेरे गांव का ही था और आम के दिनों में आम के बगीचे की रखवाली भी करता था। 

बहुत ही आकर्षक और भव्य था कार्यक्रम स्थल

इसके बाद हमलोग सीधे कार्यक्रम स्थल की ओर बढ़ चले। विशाल कचहरी मैदान का रमना मेरे आखों के सामने था। मेेरे जीवन का वो एक यादगार पल था। हमलोग सीधे मंच की ओर चले गए। वहां मुुझे कोई रोकने-टोकने वाला नहीं था। चुंकि मेरे दादाजी उसी टीमका हिस्सा थे जिसके जिम्में इसे तैयार करना था। दादाजी के एक सहकर्मी ने मुझे गुब्बारे और झंडे दिये। आठ बजे तक मंच सजकर तैयार हो चुका था। डीएम के सुरक्षाकर्मियों ने मंच से नीचे उतरने के लिेए निर्देश दिया। इसके बाद हमलोग सीढियों की तरफ चले गए। और तत्कालीन डीएम के आने का प्रतीक्षा में कर रहे थे। अगर मुझे सही-सही याद हो तो उस समय वैशाली जिले के डीएम उदय प्रताप सिंह थे।  डीएम साहब का आगमन हुआ। उनके सफेद एम्बासडर कार के बारे में क्या कहा जाए। उसका आकर्षण किसी फिल्म के अभिनेता से कम नहीं था।

एक-एक पल को आखों में कैद करने को आतुर था 

पहली बार में अपनी आखों से ये सबकुछ देख रहा था। ये मेरे लिए किसी अचम्भे से कम नहीं था। बरसात के दिनों में आकाश नीली-नीला नजर आ रहा था। उस दिन मौसम काफी सुहावना था। झंडोत्तोलन के बाद राष्ट्रगान हुआ। परेड का निरीझण खुली जीप में होते पहली बार देख रहा था। एक के बाद एक सारे कार्यक्रमों को देखा। वहां से हमलोग दस बजे के करीब निकले। लेकिन घर आते आते दिन के दो बज गए थे। 31 दिसंबर 1996 को दादाजी सेवानिवृत्त हो गए। लेकिन झंडोत्तोलन के प्रति उनका उत्साह आजीवन कम नहीं हुआ। 

घर पर ही किया पहली बार झंडोत्तोलन

पहली बार घर पर ध्वजारोहण करने का निश्यय किया तो इस बात से वो बहुत खुश हुए। ऐसा पहली बार किया जा रहा था। इसी साल ये आदेश आया था कि कोई भी आदमी अपने घर या निजी प्रतिष्ठान  पर झंडोत्तोलन कर सकता है। ये मेरे लिए ऐतिहासिक निर्णय था। चूंकि मैं पहली बार ऐसा करने जा रहा था। सभी आवश्यक तैयारियां पूरी हो चुकी थीं।बड़ी संख्या में आसपास के लोग उपस्थित थे। बहुत खुश था मैं उस दिन। फिर समय ने करवट बदली और मैं सिमट कर रह गया। समय की विडंबना देखिए जो कभी आयोजक की भूमिका होता था आज वह दर्शक बनकर के रह गया है। 22 फरवरी 2019 को दादाजी भी गुजर गए। आज मेरे पास कुछ है तो वो सिर्फ यादें है।



Monday, August 10, 2020

आसान नहीं है रविन्द्र कुमार वर्मा हो जाना

रविन्द्र कुमार वर्मा । यह नाम है एक ऐसे शख्स का जिसकी हंसी में कई राज होते हैं। बातों के अऩगिणत अर्थ होते हैं। बात 2019 की है। मैं सघर्षों के दौर में था। काम की तलाश कर रहा था। ऐसे में रविन्द्र वर्मा से पटना में मुलाकात हुई।इससे पहले मेरा कोई परिचय नहीं था। गजब का व्यक्तित्व ।बेमिसाल दायरा।आत्मीयतापूर्ण संबंध पहली मुलाकात से ही प्रगाढ़ होते चले गए। सिर्फ एक वाक्य कहा। काम करेंगे। स्वकृति में मैने सिर हिलाया। बस यही छोटा सा परिचय था हमारा। समय के साथ भाईचारा बढ़ा। और याराना भी। कभी मित्र की तरह अंतरंग बातें। कभी बड़े भाई की तरह सलाह ।कभी समझ ही नहीं पाया कि ये मित्र हैं या बड़े भाई। मैंने इनसे काफी सीखा। अखबार की बातें भी। निश्छल प्रेम करना भी। कातिल हसीं से मसले हल करना भी।शानों-शौकत रईसों जैसे। और रईस ठहरे भी।ऐस लगता है कि वर्षों पुराना याराना है।आज तक समझ नहीं आया। दोस्त कहूं या भाई साहब। या फिर गुरू। 

खाने-पीने के हैं शौकीन

ये खाने-पीने के बहुत शौकीन आदमी हैं। घूमने के भी। यहां पर खाने-पीने के शब्दयुग्म को गंभीरता से मत लीजिएगा। भंवर में फंस जाएंगे। देसी और अंग्रेजी की क्या बात करें। पानी भी ठंड़ा नहीं पीते।इन्हें मोटा अनाज खाना बहुत पसंद है। तेल-मसाला से परहेज करते हैं ।लेकिन खाना बहुत लजीज पकाते हैं । लिट्टी-चोखा खाना पसंद करने वाले लोग।अगर एक बार इनके हाथ का बना खा ले। तो समझिए उसने अमृत चख लिया। मुझे दो बार यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इनका बनाया हुआ लिट्टी 72 घंटे तक खराब नहीं होता है। मैं इस बात का साझी हूं। विशुद्ध शाकाहारी हैं।प्याज- लहसून भी नहीं खाते हैं।आयुर्वेद पर पूरा विस्वास रखने वाले हमारे रविन्द्र भइया।मौका मिलने पर बाबा को कोसने से भी नहीं चूकते। 

इनके यायावरी की चर्चा खूब होती है 

एक बार ग्वालियर जाने का मौका इनके साथ मिला। वहां एक सेमिनार में भाग लेने हमलोग गए थे। सेमिनार का आयोजन विकास-संवाद और आईटीएम यूनिवर्सिटी के संयुक्त तत्वधान में हुआ था। मेरे लिए विचारों से परे यह कार्यक्रम था। पहली बार में इसमें सहभागी हो रहा था। रविन्द्र भइया से एक बार इस कार्यक्रम के बारे में  चर्चा हुई थी। मैंने आग्रह किया कि मुझे भी साथ लेकर चलिए। तत्क्षण अपनी मौन स्वीकृति इन्होंने प्रदान कर दी। जैसै-जैसे समय नजदीक आता गया।मेरे अंदर उत्साह और उमंग का वेग हिलकोरे मारने लगा। ग्वालियर के लिए हमलोग बनारस से बुदेलखंड़ एक्सप्रेस पकड़ कर चल दिए। हमलोगों की एक छोटी सी टुकड़ी थी।जिसमें चार और लोग शामिल थे। हमारा सफर काफी सुहावाना और यादगार रहा। बातचीत का सिलसिला कभी नहीं रुका। किस्से- कहानी और हसीं ठिठोलियों का दौर कभी थमा नहीं। जीवन के कई अनछूए पहलुओं से मुखातिब होने का मौका मिला।मेरे लिए यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था। घूमने में मेरी अभिरुची हमेशा रही है। लेकिन पहली बार किसी ऐसे व्यक्ति के साथ घूम रहा था जो बहुत बड़ा यायावर था।नए-नए जगहों पर जाना। नए लोगों से मिलना।उनसे बातें करना।उनके विचारों को सुनना। उनके विस्वासों को जांचने- परखने में ये किसी घूमंतु भेटिये से कम नहीं है। इनके अंदर एक बुराई है। ये अपने अनुभवों को कलमबद्ध नहीं करते। अगर ये ऐसा करने लगे तो किसी खगोलिय घटना से कम नहीं होगा।

पैमानों से परे मित्रता

मित्रता के सम्बंध में खलील जिब्रान ने ठीक ही लिखा है कि मित्रता अवसर नहीं,बल्कि हमेशा एक मधुर उत्तरदायित्व है।  सच्चे मित्र प्रतिदान की प्रत्याशा के बिना भी आपका रक्षा-कवच होते हैं । हम सब एक पंख वाले देवदूत हैं,मित्र हमारा दूसरा पंख होते हैं । मित्र हमारे भीतर से सर्वश्रेष्ठ का उत्खनन और निष्कर्षण करते हैं। वे हमारे सपनों को उड़ान देते हैं और हमारी कल्पनाओं को मुक्त आकाश । वे हमारे सपनों के संरक्षक होते हैं ।

avinash

ख़लील जिब्रान की कही हुई एक एक बात अकाट्य सत्य की तरह मेरे व्यक्तिगत जीवन में साकार होता प्रतीत हो रहा है।आपसे निरंतर प्रेरित व अनुशासित होना मेरे लिए परमसौभाग्य की बात है।आपसे मेरा दूर दूर तक का कोई जान-पहचान नहीं था,लेकिन आपने जिस आत्मीयता से  न केवल मुझे अपनाया किया बल्कि दीक्षित व प्रशिक्षित किया। वह मेरे लिए गौरव की बात है।

Thursday, August 6, 2020

पीएम मोदी ने पारिजात का पौध श्रीराम मंदिर परिसर में लगाया

  • समुद्र मंथन के समय प्रकट हुआ था पारिजात का पौध, चौदह रत्नों में से एक था यह पौध
  • श्रीकृष्ण ने इंद्र को युद्ध में पराजित कर पारिजात के दैवीय पौध लाए थे पृथ्वीलोक पर

5 अगस्त को पीएम मोदी एक दिवसीय दौरे पर अयोध्या गए थे। पीएम का अयोध्या दौरा बेहद खास था। इस दौरान लगातार मीडिया अयोध्या में उनके कार्यक्रम को कवर कर रहा था। सबसे पहले पीएम हनुमानकोट गए और वहां हनुमानजी की पूजा-अर्चना की। इसके बाद भगवान राम के मंदिर की आधारशिला रखने के लिए भूमि पूजन किए। इस अवसर पर भूमि पूजन करने से पहले राममंदिर परिसर में प्रधानमंत्री ने पारिजात का पौध लगाया। ये कोई सामान्य पौध नहीं है। यह दैवीय पौधा है जो समुद्र मंथन से प्रकट हुआ था। इस पर छोटे-छोटे आकार के सफेद फूल खिलते हैं। पारिजात के फूल अन्य फूलों से अलग होते हैं। ये फूल रात में खिलते हैं और सुबह झड़कर नीचे गिर जोते हैं। 

धन की देवी लक्ष्मी को बेहद प्रिये हैं पारिजात के फूल 

पारिजात के फूल के बारे में हिंदू धर्म में कई तरह की मान्यताएं हैं। ऐसी मान्यता है कि पारिजात के फूल देवी लक्ष्मी को अर्पित करने पर वो बेहद प्रसन्न होती है। पौध से तोड़कर पारिजात के फूल को नहीं चढ़ाया जाता है। पूजा के लिए उन्हीं फूलों का उपयोग किया जाता है जो झड़कर नीचे गिर जाते हैं। शास्त्रों में पारिजात के फूलों को पेड़ से तोड़ना वर्जित किया गया है।

पारिजात के पौधे के बारे में पौराणिक कथा

धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार महर्षि दुर्वासा  के श्राप के कारण स्वर्गलोक श्रीहीन हो गया था। इससे सारे देवता शक्तिहीन हो गए थे। स्वर्गलोक भी उनसे छीन गया था। राक्षसों से जान बचाने के लिए छुपे रहते थे। नारदजी के सलाह पर देवराज इन्द्र सहित सारे देवतागण श्रीहरि की शरण में गए। इस कष्ट के निवारण  का उपाय सुझाने का अनुरोध देवताओं ने भगवान विष्णु से किया। भगवान विष्णु ने देवताओं से असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने की सलाह दिेया । और कहा कि समुद्र मंथन से ्अमृत की प्राप्ति होगी, जिसे पीकर सब अमर हो जाएंगे। समुद्र मंथन से चौदह रत्न प्राप्त हुए। समुद्र मंथन के दौरान पारिजात पौधा भी प्रकट हुआ जिसे देवराज इन्द्र ने स्वर्गलोक में स्थापित किया। स्वर्गलोक में इसे छूने का अधिकार सिर्फ उर्वशी नामक अप्सरा को प्राप्त था। पारिजात के पौधे को छूने के बाद उर्वशी की सारी थकान दूर हो जाती थी।

इन्द्र को युद्ध में पराजित कर श्रीकृष्ण लाए थे पारिजात के पौधे को पृथ्वीलोक पर 

धर्म ग्रंथों में पारिजात के पौधे के संबंध में अलग अलग कहानियां है। मान्यता है कि एक बार माता पार्वती ने महादेव से पारिजात के पौध आपने वाटिका में लगाने की इच्छा व्यक्त की। इसके बाद पारिजात के पौधे देने का आग्रह महादेव ने इंद्र से किया।लेकिन अपने मद में चूर देवराज इंद्र ने महादेव को पारिजात का पौध देने से यह कहते हुए माना कर दिया कि ये स्वर्गलोक की धरोहर है।इससे देवताओं को वैभव, ऐश्वर्य आदि प्राप्त होते हैं। महादेव ने फिर स्वयं पारिजात के पौधे को प्रकट किया। हरिवंशपुराण के अनुसार एक समय द्वापर युग में नारदजी श्रीकृष्ण से मिलने पृथ्वीलोक आए। उस समय नारदजी के हाथों में पारिजात के फूल थे। नारदजी ने फूल श्रीकृष्ण को भेंट किए। श्रीकृष्ण ने उस फूल को रूक्मणी को दे दिए। जब ये बात श्रीकृष्ण की एक और पत्नी सत्यभामा को ज्ञात हुई तो वो क्रोधित हो उठी। सत्यभामा ने अपनी वाटिका के लिए श्रीकृष्ण से पारिजात के पौध की मांग की । श्रीकृष्ण  के समझाने पर भी सत्यभामा ने अपना हठ नहीं छोड़ा। सत्यभामा  हठ के सामने झूकते हुए श्रीकृष्ण ने अपने एक दूत को स्वर्गलोक में पारिजात के पौध लाने के लिए भेजा। देवराज इन्द्र ने पौध देने से इंकार कर दिया । श्रीकृष्ण के दूत को  इन्द्र ने खाली हाथ वापस भेज दिया। श्रीकृष्ण को इससे बहुत ही रोष हुआ। पारिजात के पौध के लिए श्रीकृष्ण ने इंद्र पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में श्रीकृष्ण की जीत हुई।  श्रीकृष्ण ने इंद्र को पराजित कर पारिजात के पौध को ले आए। श्रीकृष्ण ने पारिजात के पौध को सत्यभामा की वाटिका में लगवा दिया। सत्यभामा को सबक सिखाने के लिए श्रीकृष्ण ने कुछ ऐसा किया कि सत्यभामा की वाटिका में पारिजात के फूल लगते और रूक्मणी की वाटिका में गिरते । आज भी पारिजात के फूल पेड़ से दूर जाकर गिरते हैं।

औषधीय गुणों का भंड़ार है पारिजात के पौधे

पारिजात के पौधे औषधीय गुणों का भंडार है। आयुर्वेद में पारिजात के पौधे से जटिल और असाथ्य रोगों के निदान का वर्ण़न किया गया है। पारिजात बावासीर के  लिए रामबाण औषधि है। पारिजात के एक बीज का प्रतिदिन सेवन करने से बावासीर ठीक हो जाता है। ऐसा दावा किया जाता है। पारिजाक के फूल ह्रदय रोग के निदान के लिए उत्तम माने जाते हैं। इसके पत्तियों को पीसकर शहद के साथ सेवन करने से सुखी खांसी ठीक हो जाती है। साथ ही त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधी रोग ठीक हो जाते हैं। गुर्दे के रोग में पौध बहुत लाभकारी है।

पत्रकारिता 1

पत्रकारिता का जंतर-मं तR प्रेस विज्ञप्तियों का अपना मिजाज होता है अखबार के दफ्तरों में प्रेस ब्रीफिंग, प्रेस कॉन्फ्रेंस, प्रेस विज्ञप्ति बहु...