Monday, August 10, 2020

आसान नहीं है रविन्द्र कुमार वर्मा हो जाना

रविन्द्र कुमार वर्मा । यह नाम है एक ऐसे शख्स का जिसकी हंसी में कई राज होते हैं। बातों के अऩगिणत अर्थ होते हैं। बात 2019 की है। मैं सघर्षों के दौर में था। काम की तलाश कर रहा था। ऐसे में रविन्द्र वर्मा से पटना में मुलाकात हुई।इससे पहले मेरा कोई परिचय नहीं था। गजब का व्यक्तित्व ।बेमिसाल दायरा।आत्मीयतापूर्ण संबंध पहली मुलाकात से ही प्रगाढ़ होते चले गए। सिर्फ एक वाक्य कहा। काम करेंगे। स्वकृति में मैने सिर हिलाया। बस यही छोटा सा परिचय था हमारा। समय के साथ भाईचारा बढ़ा। और याराना भी। कभी मित्र की तरह अंतरंग बातें। कभी बड़े भाई की तरह सलाह ।कभी समझ ही नहीं पाया कि ये मित्र हैं या बड़े भाई। मैंने इनसे काफी सीखा। अखबार की बातें भी। निश्छल प्रेम करना भी। कातिल हसीं से मसले हल करना भी।शानों-शौकत रईसों जैसे। और रईस ठहरे भी।ऐस लगता है कि वर्षों पुराना याराना है।आज तक समझ नहीं आया। दोस्त कहूं या भाई साहब। या फिर गुरू। 

खाने-पीने के हैं शौकीन

ये खाने-पीने के बहुत शौकीन आदमी हैं। घूमने के भी। यहां पर खाने-पीने के शब्दयुग्म को गंभीरता से मत लीजिएगा। भंवर में फंस जाएंगे। देसी और अंग्रेजी की क्या बात करें। पानी भी ठंड़ा नहीं पीते।इन्हें मोटा अनाज खाना बहुत पसंद है। तेल-मसाला से परहेज करते हैं ।लेकिन खाना बहुत लजीज पकाते हैं । लिट्टी-चोखा खाना पसंद करने वाले लोग।अगर एक बार इनके हाथ का बना खा ले। तो समझिए उसने अमृत चख लिया। मुझे दो बार यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इनका बनाया हुआ लिट्टी 72 घंटे तक खराब नहीं होता है। मैं इस बात का साझी हूं। विशुद्ध शाकाहारी हैं।प्याज- लहसून भी नहीं खाते हैं।आयुर्वेद पर पूरा विस्वास रखने वाले हमारे रविन्द्र भइया।मौका मिलने पर बाबा को कोसने से भी नहीं चूकते। 

इनके यायावरी की चर्चा खूब होती है 

एक बार ग्वालियर जाने का मौका इनके साथ मिला। वहां एक सेमिनार में भाग लेने हमलोग गए थे। सेमिनार का आयोजन विकास-संवाद और आईटीएम यूनिवर्सिटी के संयुक्त तत्वधान में हुआ था। मेरे लिए विचारों से परे यह कार्यक्रम था। पहली बार में इसमें सहभागी हो रहा था। रविन्द्र भइया से एक बार इस कार्यक्रम के बारे में  चर्चा हुई थी। मैंने आग्रह किया कि मुझे भी साथ लेकर चलिए। तत्क्षण अपनी मौन स्वीकृति इन्होंने प्रदान कर दी। जैसै-जैसे समय नजदीक आता गया।मेरे अंदर उत्साह और उमंग का वेग हिलकोरे मारने लगा। ग्वालियर के लिए हमलोग बनारस से बुदेलखंड़ एक्सप्रेस पकड़ कर चल दिए। हमलोगों की एक छोटी सी टुकड़ी थी।जिसमें चार और लोग शामिल थे। हमारा सफर काफी सुहावाना और यादगार रहा। बातचीत का सिलसिला कभी नहीं रुका। किस्से- कहानी और हसीं ठिठोलियों का दौर कभी थमा नहीं। जीवन के कई अनछूए पहलुओं से मुखातिब होने का मौका मिला।मेरे लिए यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था। घूमने में मेरी अभिरुची हमेशा रही है। लेकिन पहली बार किसी ऐसे व्यक्ति के साथ घूम रहा था जो बहुत बड़ा यायावर था।नए-नए जगहों पर जाना। नए लोगों से मिलना।उनसे बातें करना।उनके विचारों को सुनना। उनके विस्वासों को जांचने- परखने में ये किसी घूमंतु भेटिये से कम नहीं है। इनके अंदर एक बुराई है। ये अपने अनुभवों को कलमबद्ध नहीं करते। अगर ये ऐसा करने लगे तो किसी खगोलिय घटना से कम नहीं होगा।

पैमानों से परे मित्रता

मित्रता के सम्बंध में खलील जिब्रान ने ठीक ही लिखा है कि मित्रता अवसर नहीं,बल्कि हमेशा एक मधुर उत्तरदायित्व है।  सच्चे मित्र प्रतिदान की प्रत्याशा के बिना भी आपका रक्षा-कवच होते हैं । हम सब एक पंख वाले देवदूत हैं,मित्र हमारा दूसरा पंख होते हैं । मित्र हमारे भीतर से सर्वश्रेष्ठ का उत्खनन और निष्कर्षण करते हैं। वे हमारे सपनों को उड़ान देते हैं और हमारी कल्पनाओं को मुक्त आकाश । वे हमारे सपनों के संरक्षक होते हैं ।

avinash

ख़लील जिब्रान की कही हुई एक एक बात अकाट्य सत्य की तरह मेरे व्यक्तिगत जीवन में साकार होता प्रतीत हो रहा है।आपसे निरंतर प्रेरित व अनुशासित होना मेरे लिए परमसौभाग्य की बात है।आपसे मेरा दूर दूर तक का कोई जान-पहचान नहीं था,लेकिन आपने जिस आत्मीयता से  न केवल मुझे अपनाया किया बल्कि दीक्षित व प्रशिक्षित किया। वह मेरे लिए गौरव की बात है।

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