गांव से गायब होते फाग के राग
फाल्गुन माह बीतता जा रहा है। इसके बावजूद होली के त्योहार को लेकर लोगों में उत्साह व उमंग का संचार होता नहीं दिख रहा। इस साल होली 29 अप्रैल को मनाया जाएगा। होलिकादहन 28 मार्च को है। ग्रामीण क्षेत्रों में होली की खुमार बसंत पंचमी के दिन से ही शुरू हो जाता है। पहले लोग गोष्ठियों का आयोजन कर होली के गीत गाने में डूब जाते थे लेकिन अब समाज में धीरे-थीरे ये परंपरा कम देखने को मिल रही है। आधुनिकता के रंग में लोग पारंपरिकता को भूलते जा रहे हैं। समाज में अब होलीगीतों के आयोजन की यह परंपरा कम देखने को मिल रही है।
लोग आधुनिकता के रंग में ऐसे डूबे जा रहे हैं कि अपनी परंपरागत आचार-विचार व व्यवहार से दूर तक होली के गीतों के लिए होने वाले गोष्ठियों की आवाज सुनाई नहीं दे रही है। एक समय ऐसा भी था जब शाम होते ही दलानों पर लोग एकत्रित कर होली के गीत गाते झूमने लगते थे। बिना किसी ध्वनी विस्तारित यंत्र यानि लाउडस्पीकर के होली गीतों के उत्साह में झूलने लगते थे।
बच्चे- बूढ़े सब पूरे जोश से शामिल होते थे। होली के बारे में कहा जाता है कि यह आपसी वैमनस्यता, दुश्मनी भुलाकर गले मिलने का अवसर देता है। लोग इस मौके पर आपसी रंजिश भूलाकर होली के रंग में रंग जाते हैं। इस दौरान सब मिलकर फाग गाते हैं। ग्रामिण क्षेत्रों में फाग गीत सुनने को अब नहीं मिल रहा है। एक समय ऐसा भी था जब लोग फाल्गुन मास आते ही ढोल- मंजीरों की थाप और परंपरागत लोकगीतों की गूंज लोगों को आह्लादित कर देते थे। अब समय के साथ-साथ पारंपारिकता लुप्त होती जा रही है। हालांकि गांव के जो बड़े बुजुर्ग लोग हैं वह अपने साथ लेकर कुछ युवाओं को इस परंपरा को जीवित करने की कवायद में लगे हुए हैं।
दुर्भाग्य से होली मिलन समारोहों में पांरम्परिक लोग गीतों का स्थान भोजपुरी अश्लील गीतों ने लिया है। लोग नशे में डूब जाते हैं। और बेहोशी की हालत में अपने घर जाते हैें। इस मौके पर ध्यान देने वाली बात यह है कि ये होली का त्योहार हमारे संस्कृति की धरोहर है।
उम्दा लेखनी।
ReplyDeleteग्रामीण शुद्ध कर लेंगे। बाकी अच्छा ब्लॉग है।