अक्षयवटराय स्टेडियम में होता है मुख्य आयोजन
वैशाली जिले में मुख्य आयोजन कचहरी मैदान में होता है। अब इस कचहरी मैदान को अक्षयवटराय स्टेडियम के नाम से भी जाना जाता है। आज भी यह मैदान गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के लिए मुख्य आयोजन स्थल है।26 जनवरी और 15 अगस्त के मौके पर दादाजी तड़के सुबह जाग जाते और ऑफिस जाने की तैयारियों में जुट जाते थे। उस समय मेरे घर में अलार्म वाली घड़ी नहीं थी। रात में सोने के बाद जब भी नींद खुले उसके बाद सोते नहीं थे। सुबह के चार बजे तक सभी लोगों को जाग जाना है। ये नियम सबके ऊपर मेरे घर में लागू था।वो कचहरी जाने की तैयारियों में जुट जाते। घर के लोगों की भूमिका सहायक की होती थी। जब मैं छोटा था तो हर साल साथ चलने की जिद्द करता था। मुझे आज भी याद है वो बोलते कि अगले बार साथ लेकर चलेंगे। ये सिलसिला कई बरसों तक चलता रहा। आखिर में वो साल भी आया जब स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उनके साथ जाने का अवसर मिला। गणतंत्र दिवस के मौके पर ठंड़ के कारण कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया। घर से हम लोग साईकिल से निकले थे। उस समय सुबह के छह बज होंगे। उस समय कचहरी में साईकिल रखने के लिए कोई स्टैंड नहीं था। दादाजी ने अपनी साइकिल एक चाय की दुकान पर लगाया। वहां पहुंचते ही चायवाले दादाजी को चाय की गलास थमा दिये। और मुझे बिस्कुट खाने को दिया जबकि मेरा भी मन चाय पीने को था। ये बाद में मुझे पता चला कि वो चाय वाला मेरे गांव का ही था और आम के दिनों में आम के बगीचे की रखवाली भी करता था।
बहुत ही आकर्षक और भव्य था कार्यक्रम स्थल
इसके बाद हमलोग सीधे कार्यक्रम स्थल की ओर बढ़ चले। विशाल कचहरी मैदान का रमना मेरे आखों के सामने था। मेेरे जीवन का वो एक यादगार पल था। हमलोग सीधे मंच की ओर चले गए। वहां मुुझे कोई रोकने-टोकने वाला नहीं था। चुंकि मेरे दादाजी उसी टीमका हिस्सा थे जिसके जिम्में इसे तैयार करना था। दादाजी के एक सहकर्मी ने मुझे गुब्बारे और झंडे दिये। आठ बजे तक मंच सजकर तैयार हो चुका था। डीएम के सुरक्षाकर्मियों ने मंच से नीचे उतरने के लिेए निर्देश दिया। इसके बाद हमलोग सीढियों की तरफ चले गए। और तत्कालीन डीएम के आने का प्रतीक्षा में कर रहे थे। अगर मुझे सही-सही याद हो तो उस समय वैशाली जिले के डीएम उदय प्रताप सिंह थे। डीएम साहब का आगमन हुआ। उनके सफेद एम्बासडर कार के बारे में क्या कहा जाए। उसका आकर्षण किसी फिल्म के अभिनेता से कम नहीं था।
एक-एक पल को आखों में कैद करने को आतुर था
पहली बार में अपनी आखों से ये सबकुछ देख रहा था। ये मेरे लिए किसी अचम्भे से कम नहीं था। बरसात के दिनों में आकाश नीली-नीला नजर आ रहा था। उस दिन मौसम काफी सुहावना था। झंडोत्तोलन के बाद राष्ट्रगान हुआ। परेड का निरीझण खुली जीप में होते पहली बार देख रहा था। एक के बाद एक सारे कार्यक्रमों को देखा। वहां से हमलोग दस बजे के करीब निकले। लेकिन घर आते आते दिन के दो बज गए थे। 31 दिसंबर 1996 को दादाजी सेवानिवृत्त हो गए। लेकिन झंडोत्तोलन के प्रति उनका उत्साह आजीवन कम नहीं हुआ।
घर पर ही किया पहली बार झंडोत्तोलन
पहली बार घर पर ध्वजारोहण करने का निश्यय किया तो इस बात से वो बहुत खुश हुए। ऐसा पहली बार किया जा रहा था। इसी साल ये आदेश आया था कि कोई भी आदमी अपने घर या निजी प्रतिष्ठान पर झंडोत्तोलन कर सकता है। ये मेरे लिए ऐतिहासिक निर्णय था। चूंकि मैं पहली बार ऐसा करने जा रहा था। सभी आवश्यक तैयारियां पूरी हो चुकी थीं।बड़ी संख्या में आसपास के लोग उपस्थित थे। बहुत खुश था मैं उस दिन। फिर समय ने करवट बदली और मैं सिमट कर रह गया। समय की विडंबना देखिए जो कभी आयोजक की भूमिका होता था आज वह दर्शक बनकर के रह गया है। 22 फरवरी 2019 को दादाजी भी गुजर गए। आज मेरे पास कुछ है तो वो सिर्फ यादें है।



🇮🇳🇮🇳
ReplyDeleteआभार जी आपका
ReplyDeleteShandar
ReplyDeleteधन्यवाद साहब।
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