- विदेशों में अघ्र्यथाली का अभन्नि अंग बना झौंवा का अरता पात
- तीन माह पहले से ही शुरू हो जाता है अरता पात का नर्मिाण
देश के विभन्नि भागों और विदेशों में सूर्य की उपासना के महापर्व छठ पर आराधना का अहम हस्सिा बने अरतापात का हुनर सारण की बेटियां अपने संस्कारों के साथ पिया घर ले जा रही हैं। प्रदेश के विभन्नि जिलों में अरतापात का हो रहा नर्मिाण इसका जीता जागता उदाहरण है। दरअसल सारण जिले के झौंवा गांव में दशकों से अरतापात का नर्मिाण होता है और यहीं से प्रदेश व देश के अन्य हस्सिों के अलावा विदेशों में भी इसे भेजे जाने का प्रचलन रहा है। इस नर्मिाण में यहां की सत्तर फीसदी महिलाएं जुड़ी हैं और इसी की बदौलत इनका परिवार पलता है। यहां की बेटियां बाबुल के घर रह कर संस्कार तो ग्रहण करती ही हैं, अरतापात के नर्मिाण का हुनर भी सीखती हैं। जब ब्याह कर पिया घर जाती हैं तो उनके संग हुनर भी होता है। अपनी इस कला की आभा उन क्षेत्रों में न सर्फि फैला रही हैं बल्कि लोगों को सीखा कर आत्मनर्भिर भी बना रही हैं।
आर्थिक समृद्धि का जरिया बना अरता पात
जिले के अवतारनगर थाना क्षेत्र के झौंवा गांव में अरता पात का नर्मिाण होता है। यह इस गांव की आर्थिक समृद्धि का जरिया है। छठ पर्व के तीन माह पहले से इसका नर्मिाण शुरू हो जाता है। लगभग चार सौ घरों के बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक इस कारोबार से जुड़े हैं। घर की महिलाएं, बच्चियां, बच्चे, युवक भी उत्साह से हाथ बंटाते हैं। हुनर सीखते हैं।
महावर का भी नर्मिाण
अरता पात के अलावा लाल महावर भी इस क्षेत्र की खासियत है। यह करीब थाली के बराबर होता है। अरता पात वाली सामग्री से ही इसका भी नर्मिाण होता है। आकार बड़ा हो जाता है। इसका उपयोग मिथिलांचल में होता है। फसल अच्छी होने पर वहां के किसान व गृहस्थ अपने खेतों में लाल महावर उड़ाकर धरती का शृंगार करते हैं। दूसरी ओर दुकानदार समृद्धि के प्रतीक महावर व अरता पात को अपनी दुकान में रखते हैं।
सारण के अरता पात की खासियत
सारण के झौंवा के अरता पात का नर्मिाण काफी श्रमसाध्य है। झौंवा गांव के दीपक कुमार ने बताया कि अकवन की फली तोड़कर रूई निकाला जाता है। रूई को बेसन व लाल रंग में मिलाकर पानी में भिंगोया जाता है। फिर धूप में सुखाया जाता है। उसके बाद रंगीन रूई की धुनाई होती है। यहां के प्राय: हर घर में छोटा-सा धुनिया है। रूई की धुनाई के बाद मट्टिी की ढकनी से उसे गोल-गोल आकार देकर काटा जाता है। उसके बाद छह, दस, बीस, पचास का सेट बनाया जाता है। उसके बाद बंडल तैयार होता है।
ह्यकूरियर ह्ण होती है परंपरा
रक्षा बंधन में जैसे बहनें विदेश में रहने वाले भाइयों को राखी भेजकर परंपरा को जीवंत करती हैं वैसे ही छठ के समय झौंवा का अरता पात भी कूरियर व अन्य माध्यमों से विदशों में अघ्र्य की थाली का अभन्नि अंग बन जाता है। कूरियर के माध्यम से अमेरिका, कनाडा, दुबई, सिंगापुर, मॉरीशस, सूरीनाम जैसे देशों में भी छठ करने के लिए अरता पात भेजा जाता है। पटना में रहने वाले सद्धिनाथ सिंह बताते हैं कि उनका बेटा अमेरिका में इंजीनियर है। हर साल वे झौंवा आकर अरता पात खरीदते हैं और अपने बेटे को भेजते हैं। अपने बिहारवासी अन्य साथियों के यहां भी अरता पात वहीं देता है।
आर्थिक सबलता दिलाता है अरता पात
झौंवा क्षेत्र के लोगों को अरता पात आर्थिक सबलता दिलाता है। स्थानीय एक कारीगर विनोद कुमार ने बताया कि लागत की तुलना में दोगुना लाभ हो जाता है। छोटे स्तर का व्यवसाय है। फिर भी हर बनाने वाले को दस से बारह हजार रुपये तक की बचत होती है।
डिजिटल क्रांति का उपयोग कर रहे युवक
अरता पात के व्यवसाय के लिए स्थानीय युवक डिजिटल क्रांति का उपयोग कर स्थानीय लोगों को सहयोग कर रहे हैं। ह्वाट्स एप के माध्यम से अरता पात की तस्वीर भेजी जाती है। ऑर्डर लिया जाता है। कई लोगों को तो पेमेन्ट भी इसी माध्यम से होता है। अरता पात बन जाने पर ले जाने के लिए दूसरे प्रदेशों से व्यापारी आते हैं। मई-जून के महीने में व्यापारी ऑर्डर बुक कराते हैं।
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