अविनाश मिश्रा । 06 अक्टूबर को मेरा साप्ताहिक अवकाश था तो मैं निश्चिंत भाव से अपने घर के छत पर बैठकर पुराने गाने सुन रहा था। शाम का समय । चारों तरफ अंधेरा और घाना होते जा रहा था। आकाश में तारे टिमटिमाने लगे थे। इन सब के बीच पुराने गाने सुनने का अपना ही आनंद होता है। मेरा गाँव अभी शहर नहीं हुआ है। लेकिन शहर होने के रास्ते पर है। इसलिए शांत है। अमूमन जैसा पहाड़ी गाँव में होता है। बिल्कुल उसी तरह का मेरा भी गाँव है। शाम में पोहा खाने के बाद चाय पी रहा था। तभी ऑफिस से रविंद्र भइया का फोन आया। मैं थोड़ा सा अचंभित हुआ। चूंकि शाम में उनके काम करने का समय होता है।...फिर फोन क्यूं कर रहे हैं।फोन रिसीव करने के बाद मैंने उन्हें नमस्ते बोला। मेरे नमस्ते के जवाब में उन्होंने भी नमस्ते कहा। इसके बाद उन्होंने एक सामान सा प्रश्न किया । तब छुट्टी का भरपूर आंनद ले रहे हैं। बातचीत का सिलसिला कुछ आगे बढ़ा तो उन्होंने कहा कि शंकर जी का वैशाली घूमने का कार्यक्रम है। इतने सुनने के बाद मेरे मन-मस्तिष्क में हिलोरें उठने शुरू हो गए। चूंकि कुछ दिनों पहले ही हमलोगों का मैथन और धनबाद घूमने का कार्यक्रम कुछ कारणवश रद्द हुआ था।घूमना मेरा सबसे पसंदीदा काम है। नए-नए जगहों पर जाना, नए नए लोगों से मिलना और लोकल स्ट्रीट पर खाना, खाना मुझे बहुत पसंद है। ऐतिहासिक वैशाली गढ़ मेरे घर के इतने नजदीक होने के बावजूद मैं कभी नहीं गया था। हालांकि वैशाली गढ़ के आसपास पारिवारिक रिश्तेदारों की तादाद अच्छी है।इसके बावजूद कभी जाने का मौका नहीं मिला ।कार्यक्रम तय हुआ कि अगले दिन यानी कि 07 अक्टूबर को सुबह-सुबह घर से निकल जाना है । चलने के लिए एक रोडमैप तैयार किया गया। प्रमुख पर्यटन स्थलों को चिन्हित किया गया। समय निश्चित हुआ कि सुबह 10 बजे सभी लोग मेरे घर आएंगे।
इसके बाद हमलोग गंतव्य स्थान की ओर प्रस्थान करेंगे। निर्धारित समय से हमारा कार्यकम थोड़ा सा विलंब हो गया था। अमूमन जैसा कि कार्यक्रम के साथ अंतिम समय तक फेरबदल की सम्भवनाएँ बनी रहती है। इस कार्यक्रम के साथ भी कुछ ऐसा ही होने वाला था। समय और वादे के पाबंद रविन्द्र भइया इस कारण थोड़े से नाराज हो गए। लेकिन उनके हठयोग की साधना में लीन होने के पहले ही हमलोगों ने अपने प्रेम से उनको अविभूत कर दिया। इसके संभावित परिणाम मन में आकर लेने लगे थे लेकिन तैयारियों के रफ्तार को शंकर जी ने कम नहीं होने दिया ।
सुबह के दस बजे जी जगह ग्यारह बजे सभी लोग मेरे घर आएं। रविन्द्र भइया को सर्वसम्मति से इस यात्रा के लिए अभिभावक चुना गया। हमलोग क्षणभर का अब विलंब किये बिना राजा विशाल के गढ़ का अवलोकन करने के लिए निकल पड़े। वैशाली का अस्तित्व रामायण कालीन है। राजा विशाल परमप्रतापी राजा था। लिच्छवी राज्य को प्रथम गणराज्य होने का गौरव प्राप्त हुआ। कालांतर में यह जिला वैशाली के नाम से प्रचलित हुआ। मैं वैशाली जिले का ही रहने वाला हूं। इस जिले का मुख्यालय हाजीपुर में है। मेरा गाँव इसके पास में ही सदर ब्लॉक में पड़ता है। वैशाली गढ़ के इतने नजदीक होने के बावजूद वहाँ जाने का मौका कभी नहीं मिला।
सात अक्टूबर को आकाश बिल्कुल साफ था। इस कारण तीक्ष्ण धूप को बखूबी हमलोग महसूस कर रहे थे। हमने वैशाली जाने के लिए सराय-लालगंज-वैशाली वाले मार्ग को चुनना बेहतर समझा। चूंकि इस मार्ग पर भीड़भाड़ थोड़ी कम होती है। शानदार रास्ता होने की वजह से एक घण्टे में हमलोग आराम से बिना भटके हुए वैशाली गढ़ पर दस्तक दे दिए। जैसे ही हमने नवनिर्मित रेलवे ट्रैक को पार किया तो एक आत्मिक खुशी का संचार होने लगा। मन उमंग से भर गया। जिसे उस समय साफ-साफ देखा जा सकता था। पहले हमलोग चौमुखी महादेव मंदिर गए। वहाँ देवाधिदेव महादेव का दर्शन और पूजन कर उनसे आशीर्वाद मांगे। इसके बाद एक स्थानीय गाइड से पर्यटक स्थलों के बारे में प्राथमिक जानकारी एकत्रित किये। उसने वैशाली गढ़ जाने का रास्ता हमलोगों को बताया। उसके बताए रास्ते से हमलोग वैशाली गढ़ के भग्नावशेष का अवलोकन नजदीक किये। फ़ोटो खिंचवाते हुए चाहरदीवारी का चक्कर कब पूरा हो गया। पता ही नहीं चला। फिर हमलोगों ने विश्व शांतिस्तूप , अभिषेक पुष्पकर्णी पोखर, वैशाली संग्रहालय आदि-आदि का भ्रमण किया। वहां जानकर शांति का कितना अनुभव हुआ इसका अंदाजा तो नहीं हुआ। लेकिन ये परम् ज्ञान प्राप्त हुई कि ऐसे स्थानों पर अकेले नहीं जाना चाहिए।
घड़ी की सूई अपने रफ्तार से चल रही थी। और समय को बांध भी कौन पाया है-प्रभु। बिट्टू जी ने कुछ ख़रीदारी किए।शायद उन्हें इसी को कुछ उपहार देकर अपने इस वैशाली यात्रा को यादगार बनाना था। इस मौके को भुनाने में शंकर जी भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने भी अष्टधातु से निर्मित एक जोड़ा घँटी खरीदे । अष्टधातु इसलिए कि दुकानदार ने ऐसा ही बोलकर हमलोगों को खरीदने के लिए प्रभावित किया था। रवींद्र भइया की चाहत थी कि वो अशोक स्तभ को ही खरीद लें। इसके लिए उन्होंने बाकायदा बोली भी लगा दिए। लेकिन हमारी चाहतें कब पूरी हो पाती हैं। साहब। माफ़ कीजिएगा! अशोक स्तंभ वो वाला नहीं था।
जिसके बारे में आपलोग सोचने लगे।ये तो लकड़ी का अशोक स्तभ था।किसी कारीगर के हाथों की अनुपम कलाकृति। रविन्द्र भइया ने दुकानदार को निराश नहीं किया। उन्होंने ने लकड़ी के बने कुछ बेहतरीन सजावटी खिलौने खरीदे। तीन बजने के साथ ही हमलोगों की बेचैनी बढ़ने लगीं। आने में थोड़े से भटक गए थे। और लालगंज शहर के पुराने बाज़ार गांधी चौक और पोस्ट ऑफिस चौक के जाम में जब जकड़े तो हमारी बेचैनी सातवें आसमान पर थी। खैर! पूरे एक घण्टे का समय घर वापस आने में लगा। थोड़ा सुस्ताने के बाद ये लोग पटना के लिए निकल पड़े।
दिन- बुधवार
तारीख- 07-10-2020
दिन- बुधवार
तारीख- 07-10-2020




बहुत खूब 👍
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