Friday, October 30, 2020

सभ्यता के आगमन के लिए बना पटना में द्वार

नई दिल्ली के इंडिया गेट और मुबंई के गेटवे ऑफ इंडिया की तर्ज पर पटना में सभ्यता द्वार का निर्माण कराया गया है। सभ्यता द्वार के शीर्ष पर अशोक स्तंभ बना हुआ है। सूर्यास्त के समय यह देखने में बहुत ही रमणीय लगता है। इसके साथ ही सभ्यता द्वार के आसपास काफी खूबसूरत गार्डेन बनाया गया है। घास का लॉन बनाया गया है जो पर्यटक को बरबस अपनी ओर आकर्षित करता है। गंगाजी के किनारे बने सभ्यता द्वार के ऊपर चार महापुरुषों के विचारों को अंकित किया गया है। सभ्यता द्वार के एक साइड महावीर और मेगास्थानीज तथा दूसरी ओर बुद्ध और सम्राट अशोक को स्थान दिया गया है। ये चारों प्राचीन बिहार के गौरव के स्तंभ रहे हैं।

निशुल्क है सभ्यता द्वार पार्क में प्रवेश 

सभ्यता द्वार पार्क का दीदार कोई भी कर सकता है। इसके लिए कोई पैसा नहीं लगता है। प्रवेश पूरी तरह से निशुल्क रखा गया है। इसलिए यहां पर्यटकों की भीड़ हमेशा रहती है। विशेषकर शाम के समय इस पार्क की रौनक देखने लायक होती है। सुबह दस बजे से शाम के छह बजे तक सभ्यता द्वार पार्क में निशुल्क प्रवेश कर आनंद उठाया जा सकता है। पटना का यह सभ्यता द्वार मौर्यशैली के वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। इसका निर्माण रेड एंड वाइट सैंड स्टोन से किया है। करीब एक एकड़ में सभ्यता एरिया में सभ्यता द्वार और आसपास का परिसर फैला हुआ है। जमीन परल एलईडी सीरीज लाइट की रोशनी का आर्कषण मनमोहने के लिए काफी है। 


कैसे पहुंचे सभ्यता द्वार

गांधी मैदान के पास होने के कारण बहुत ही आसानी से सभ्यता द्वार के पास पहुंचा जा सकता है। यह ज्ञान भवन व बापूसभागार के ठीक पीछे है। एएन सिन्हा संस्थान के बगल से आनेजाने के लिए शानदार रास्ता बनाया हुआ है । सम्राट अशोक कन्वेंशन सेन्टर में 32 मीटर ऊंचे सभ्यता द्वार की झलक दूर से भी देखा जा सकता है। पटना के युवाओं का बीच यह तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। शाम के समय प्रेमी जोड़ें बड़ी संख्या में आते हैं। आर्कषक लाइट और साउंड के साथ ढलते हुए सुर्य को घंटों निहारते हैं। 

सभ्यता द्वार की रमणीयता को मैंने भी नजदीक से निहारा

पटना में रहते हुए मुझे काफी दिन हो गए थे । घूमने के लिए कहीं नहीं गया था। इसलिए मन थोड़ा- थोड़ा सा असहज हो रहा था। फिर क्या था। एक साप्ताहिक अवकाश के दिन कार्यक्रम तय हुआ। लेकिन कहां जाना हा यह तय नहीं हुआ था। अपने मित्रों से सभ्यता द्वार की भव्यता और सुंदरता के संबंध में बहुत सुना था। मेरा भी मन था कि एक बार सभ्यता द्वार के रमणीयता को नजदीक से देखूं। एक दिन अपने के छोटे भाई अजीत को लेकर सभ्यता द्वार के दीदार करने के लिए निकल पड़े। तकरीबन शाम के चार बज रहे थे। वहां का नजारा बहुत ही अद्भूत था। धीमे -धीमे बजते हिंदी फिल्मों की धुन औक कलकल बहती गंगाजी की अविरल धारा मुबंई के गेटवे ऑफ इंडिया को टक्कर दे रहे थे। ठंड़ी-ठंड़ी बहती हवा और शहर के कोलाहल से दूर शांति का नजारा। अद्भूत। सभ्यता द्वार पार्क परिसर बहुत ही साफ-सुथरा था। यहां स्वच्छ भारत अभियान का असर देखा जा सकता है। इसके केयर-टेकर ने पार्क का पूरी-पूरा ध्यान रखा है। यह विशेषकर प्रेमीजोड़ों के लिए बहुत ही रमणीय स्थल है।  अकेले जाने वाले स्वयं को कुठिंत महसूस कर सकते है। इसलिए अच्छा होगा कि जोडें में घूमने जाएं।    


Thursday, October 29, 2020

वैशाली जिला में चुनावी समर...

- हाजीपुर के मतदाताओं ने  वामपंथियों को भी नहीं किया निराश

- राजद और भाजपा के बीच यहां  होती है काटें की टक्कर

चुनावी बिगुल बज चुका है। राजनीति के छत्रप कमर कसकर सियासी मैदान में कूद चुके हैं। वैसे तो समूचे  बिहार में राजनैतिक सजगता हमेशा बनी रहती है। फिर भी कुछ ऐसे सीटें हैं जहां ये घमासान कभी थमता नहीं है। ऐसे ही बिहार का वैशाली जिला है । वैशाली जिले में विधानसभा की कुल आठ सीट है। इस बार यहां दो चरणों मतदान होगा। चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार जिले के वैशाली, लालगंज, महनार, हाजीपुर, राघोपुर और राजापाकड़ विधानसभा सीट के लिए दूसरे चरण में तीन नवंबर को मतदान होगा। वहीं पातेपुर और महुआ विधानसभा के लिए तीसरे चरण में सात नवंबर को मतदान होगा। 

भाजपा के गढ़ के रूप में उभरता हाजीपुर विधानसभा

वैशाली जिले में कुल आठ विधानसभा की सीटें है। जिसमें हाजीपुर और राघोपुर विधानसभा की सीट के मतदाताओं का मिजाज बदलना राजनैतिक धुरंघरों के लिए कभी भी आसान नहीं रहा। हाजीपुर विधानसभा क्षेत्र को उत्तर बिहार का प्रवेश द्वार कहा जाता है।1952 के चुनाव में  इस सीट पर कांग्रेस के सरयुग यादव ने विजयी पताका लहराया था । इसके बाद से कांग्रेस और समाजवादी दलों के उम्मीदवार यहां से जीतकर विधानसभा में  हाजीपुर का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। हांलाकि हाजीपुर के मतदाताओं ने  वामपंथियों को भी निराश नहीं किया। हाजीपुर विधानसभा से भाकपा के किशोरी प्रसन्न सिंह ने 1967 में जीतकर सबको चोंका दिया था। लगभग पचास वर्षों तक हाजीपुर विधानसभा क्षेत्र पर समाजवादियों  का दबदबा रहा। भाजपा ने वर्ष 2000 में जीत का स्वाद पहली बार चखा। पिछले बीस बरसों से हाजीपुर विधानसभा क्षेत्र पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है। हाजीपुर सीट वैशाली जिले में भाजपा के गढ़ के रुप में उभरा है। हालंकि राजद और भाजपा के बीच यहां काटें की टक्कर होती है। जीत- हार का अंतर ज्यादा नहीं रहता है।  फिर भी हाजीपुर विधानसभा क्षेत्र पर भाजपा की मजबूत पकड़ है। वर्ष 2000 में भाजपा  की जीत के साथ हाजीपुर की राजनीति में कैडर आधारित वोट वैंक के रुप में यह आकार लेना शुरु किया। इसके सुत्रधार रहे है उस समय के युवा नेता और वर्तमान सरकार में गृहराज्यमंत्री नित्यानंद राय। नित्यानंद राय एक समन्वयकारी नेता के रुप में उभरे। समाज के सभी वर्गों को साधने में महारत उनके कद को लगातार बढ़ा रहा है। मौजूदा समय में केन्द्र की मोदी सरकार में वो राज्यमंत्री हैं। वह लगातार 2014 से समस्तीपुर के उजीयारपुर से सांसद हैं। इसके बावजूद नित्यानंद राय की हाजीपुर विधानसभा क्षेत्र पर मजबूत पकड़ है ।

Thursday, October 15, 2020

कोरोना संक्रमण के बीच अनलॉक05 में राजा विशाल के गढ़ का अवलोकन

अविनाश मिश्रा । 06 अक्टूबर को मेरा साप्ताहिक अवकाश था तो मैं निश्चिंत भाव से अपने घर के छत पर बैठकर पुराने गाने सुन रहा था। शाम का समय । चारों तरफ अंधेरा और घाना होते जा रहा था। आकाश में तारे टिमटिमाने लगे थे। इन सब के बीच पुराने गाने सुनने का अपना ही आनंद होता है। मेरा गाँव अभी शहर नहीं हुआ है। लेकिन शहर होने के रास्ते पर है। इसलिए शांत है। अमूमन जैसा पहाड़ी गाँव में होता है। बिल्कुल उसी तरह का मेरा भी गाँव है। शाम में पोहा खाने के बाद चाय पी रहा था। तभी ऑफिस से रविंद्र भइया का फोन आया। मैं थोड़ा सा अचंभित हुआ। चूंकि शाम में उनके काम करने का समय होता है।...फिर फोन क्यूं कर रहे हैं।

फोन रिसीव करने के बाद मैंने उन्हें नमस्ते बोला। मेरे नमस्ते के जवाब में उन्होंने भी नमस्ते कहा। इसके बाद उन्होंने एक सामान सा प्रश्न किया । तब छुट्टी का भरपूर आंनद ले रहे हैं। बातचीत का सिलसिला कुछ आगे बढ़ा तो उन्होंने कहा कि शंकर जी का वैशाली घूमने का कार्यक्रम है। इतने सुनने के बाद मेरे मन-मस्तिष्क में हिलोरें उठने शुरू हो गए। चूंकि कुछ दिनों पहले ही हमलोगों का मैथन और धनबाद घूमने का कार्यक्रम कुछ कारणवश रद्द हुआ था।घूमना मेरा सबसे पसंदीदा काम है। नए-नए जगहों पर जाना, नए नए लोगों से मिलना और लोकल स्ट्रीट पर खाना, खाना मुझे बहुत पसंद है। ऐतिहासिक वैशाली गढ़ मेरे घर के इतने नजदीक होने के बावजूद मैं कभी नहीं गया था। हालांकि वैशाली गढ़ के आसपास पारिवारिक रिश्तेदारों की तादाद अच्छी है।इसके बावजूद कभी जाने का मौका नहीं मिला ।कार्यक्रम तय हुआ कि अगले दिन यानी कि 07 अक्टूबर को सुबह-सुबह घर से निकल जाना है । चलने के लिए एक रोडमैप तैयार किया गया। प्रमुख पर्यटन स्थलों को चिन्हित किया गया। समय निश्चित हुआ कि सुबह 10 बजे सभी लोग मेरे घर आएंगे।
इसके बाद हमलोग गंतव्य स्थान की ओर प्रस्थान करेंगे। निर्धारित समय से हमारा कार्यकम थोड़ा सा विलंब हो गया था। अमूमन जैसा कि कार्यक्रम के साथ अंतिम समय तक फेरबदल की सम्भवनाएँ बनी रहती है। इस कार्यक्रम के साथ भी कुछ ऐसा ही होने वाला था। समय और वादे के पाबंद रविन्द्र भइया इस कारण थोड़े से नाराज हो गए। लेकिन उनके हठयोग की साधना में लीन होने के पहले ही हमलोगों ने अपने प्रेम से उनको अविभूत कर दिया। इसके संभावित परिणाम मन में आकर लेने लगे थे लेकिन तैयारियों के रफ्तार को शंकर जी ने कम नहीं होने दिया ।
सुबह के दस बजे जी जगह ग्यारह बजे सभी लोग मेरे घर आएं। रविन्द्र भइया को सर्वसम्मति से इस यात्रा के लिए अभिभावक चुना गया। हमलोग क्षणभर का अब विलंब किये बिना राजा विशाल के गढ़ का अवलोकन करने के लिए निकल पड़े। वैशाली का अस्तित्व रामायण कालीन है। राजा विशाल परमप्रतापी राजा था। लिच्छवी राज्य को प्रथम गणराज्य होने का गौरव प्राप्त हुआ। कालांतर में यह जिला वैशाली के नाम से प्रचलित हुआ। मैं वैशाली जिले का ही रहने वाला हूं। इस जिले का मुख्यालय हाजीपुर में है। मेरा गाँव इसके पास में ही सदर ब्लॉक में पड़ता है। वैशाली गढ़ के इतने नजदीक होने के बावजूद वहाँ जाने का मौका कभी नहीं मिला।
सात अक्टूबर को आकाश बिल्कुल साफ था। इस कारण तीक्ष्ण धूप को बखूबी हमलोग महसूस कर रहे थे। हमने वैशाली जाने के लिए सराय-लालगंज-वैशाली वाले मार्ग को चुनना बेहतर समझा। चूंकि इस मार्ग पर भीड़भाड़ थोड़ी कम होती है। शानदार रास्ता होने की वजह से एक घण्टे में हमलोग आराम से बिना भटके हुए वैशाली गढ़ पर दस्तक दे दिए। जैसे ही हमने नवनिर्मित रेलवे ट्रैक को पार किया तो एक आत्मिक खुशी का संचार होने लगा। मन उमंग से भर गया। जिसे उस समय साफ-साफ देखा जा सकता था। पहले हमलोग चौमुखी महादेव मंदिर गए। वहाँ देवाधिदेव महादेव का दर्शन और पूजन कर उनसे आशीर्वाद मांगे। इसके बाद एक स्थानीय गाइड से पर्यटक स्थलों के बारे में प्राथमिक जानकारी एकत्रित किये। उसने वैशाली गढ़ जाने का रास्ता हमलोगों को बताया। 
उसके बताए रास्ते से हमलोग वैशाली गढ़ के भग्नावशेष का अवलोकन नजदीक किये। फ़ोटो खिंचवाते हुए चाहरदीवारी का चक्कर कब पूरा हो गया। पता ही नहीं चला। फिर हमलोगों ने विश्व शांतिस्तूप , अभिषेक पुष्पकर्णी पोखर, वैशाली संग्रहालय आदि-आदि का भ्रमण किया। वहां जानकर शांति का कितना अनुभव हुआ इसका अंदाजा तो नहीं हुआ। लेकिन ये परम् ज्ञान प्राप्त हुई कि ऐसे स्थानों पर अकेले नहीं जाना चाहिए।
घड़ी की सूई अपने रफ्तार से चल रही थी। और समय को बांध भी कौन पाया है-प्रभु। बिट्टू जी ने कुछ ख़रीदारी किए।शायद उन्हें इसी को कुछ उपहार देकर अपने इस वैशाली यात्रा को यादगार बनाना था। इस मौके को भुनाने में शंकर जी भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने भी अष्टधातु से निर्मित एक जोड़ा घँटी खरीदे । अष्टधातु इसलिए कि दुकानदार ने ऐसा ही बोलकर हमलोगों को खरीदने के लिए प्रभावित किया था। रवींद्र भइया की चाहत थी कि वो अशोक स्तभ को ही खरीद लें। इसके लिए उन्होंने बाकायदा बोली भी लगा दिए। लेकिन हमारी चाहतें कब पूरी हो पाती हैं। साहब। माफ़ कीजिएगा! अशोक स्तंभ वो वाला नहीं था।
 जिसके बारे में आपलोग सोचने लगे।ये तो लकड़ी का अशोक स्तभ था।किसी कारीगर के हाथों की अनुपम कलाकृति। रविन्द्र भइया ने दुकानदार को निराश नहीं किया। उन्होंने ने लकड़ी के बने कुछ बेहतरीन सजावटी खिलौने खरीदे। तीन बजने के साथ ही हमलोगों की बेचैनी बढ़ने लगीं। आने में थोड़े से भटक गए थे। और लालगंज शहर के पुराने बाज़ार गांधी चौक और पोस्ट ऑफिस चौक के जाम में जब जकड़े तो हमारी बेचैनी सातवें आसमान पर थी। खैर! पूरे एक घण्टे का समय घर वापस आने में लगा। थोड़ा सुस्ताने के बाद ये लोग पटना के लिए निकल पड़े।
दिन- बुधवार
तारीख- 07-10-2020

पत्रकारिता 1

पत्रकारिता का जंतर-मं तR प्रेस विज्ञप्तियों का अपना मिजाज होता है अखबार के दफ्तरों में प्रेस ब्रीफिंग, प्रेस कॉन्फ्रेंस, प्रेस विज्ञप्ति बहु...