Tuesday, August 25, 2020

नेकी के सौदागर हैं सुजीत...

सुजीत कुमार। यही नाम है इनका। मेरे स्कूल के दिनों के मित्र हैं।आजकल भारत सरकार की महारत्न कम्पनी भेल में काम करते हैं। तश्वीर में बिटिया अद्विका और इनकी पत्नी हैं। भाभी जी कामकाजी महिला हैं और अस्पताल प्रबंधन में उच्च शिक्षा लेने के बाद हॉस्पिटल मैनेजमेंट का काम करती हैं। मेरे जीवन में इनका स्थान असाधारण है। ये बहुत अच्छे और गहरे मित्र हैं। 23 अगस्त को इनकी बिटिया अद्विका का जन्मदिन था। अद्विका का यह दूसरा जन्मदिन था। माता-पिता के लिए अपने बच्चों के जन्मदिन का विशेष उत्साह होता है। सुजीत के लिए भी यह मौका विशेष था। और विशेष हो क्यूं न भला। अद्विका इनदोनों की पहली संतान जो है।

अनाथालय में मनाया जन्मदिन

सार्वजनिक जीवन में सुजीत दिखावे से हमेशा ही दूर रहते हैं। अपनी बिटिया अद्विका का जन्मदिन चुपके से एक अनाथालय में मना लिए और किसी को इसकी भनक तक लगने नहीं दिया। ऐसे मौके पर मित्र सेे हमेशा भोजन की उम्मीद तो की ही जा सकती है। खैर, इस साल कोरोना की वजह से ऐसा संभव नहीं हो सका। लेकिन सुजीत के निर्णय ने मुझे झकझोर कर रख दिया। स्कूल के दिनों में भी ये सुलझे हुए फैसले लेने के कारण सबके प्रिय रहे हैं। मै व्यक्तिगत रुप से इनके निर्णय की प्रशंसा करता हूं।इसके लिए बिना भाभीजी के सहमति के ऐसा करना आसान नहीं था। इस नेक कार्य में भाभीजी ने अपना भरपूर सहयोग दिया। दोनों ने पहले ऑनलाइन माध्यम से एक अनाथालय को ढूंढ़ा। इनके घर से सेवा भारती का मातृछाया नामक अनाथालय निकट था। दोनों ने वहीं जाकर अपनी बिटिया अद्विका का जन्मदिन बिल्कुल साधारण तरीके से मनाया। कोई आडंबर नहीं किया। किसी जमघट का माहौल नहीं बनाया। मातृछाया के केयर-टेकर ने इस दौरान विशेष सावधानी बरतने का निर्देश दिया था। जिसका अनुपालन दोनों ने किया। अनाथालय के बच्चों को दोपहर के भोजन के लिए एक निश्चित राशि का दान मातृछाया अनाथालय प्रबंधक को दिया। 

पुराने दोस्तों में से एक हैं सुजीत

सुजीत और मैं हाईस्कूल में मिले थे। सीधे मेरा नामांकन नौवी कक्षा में काराया गया था। हाईस्कूल मेरे घर से काफी दूर था। इसलिए एक पुरानी साईकिल स्कूल जाने-आने के लिए मिला था। उसी से मैं स्कूल जाता-आता था। मै काफी डरा-सहमा हुआ रहता था। ये परेशानी आज भी मेरे साथ है।पहली बार घर से इतनी दूर जाने के लिए घरवाले भेज रहे थे। नामांकन के बाद पहली बार मै स्कूल गया। तो किसी ने आगे की पंक्तियों में बैठने नहीं दिया। उसदिन मै पीछे से दूसरे नबंर की पंक्ति में बैठा था। स्कूल का पहला दिन मेरे लिए किसी सदमें से कम नहीं था। मेरे सपने कोसी के तटबंध की तरह रिसने लगे थे। मै हताश और निराश था। स्कूल छोड़ भी नहीं सकता था। दूसरे स्कूल में नांमाकन के लिए बोलना किसी जघन्य अपराध की सजा भुगतने जैसा भयानक अनुभव देने वाला था।इसलिए चुप रहना ही बेहतर समझा। कक्षा में दूसरे दिन आगे से तीसरी पंक्ति में बैठने का मौका मिला। और एक दिन उसी पंक्ति में सुजीत मुझे मिले। समय के साथ हमारी मित्रता प्रगाढ़ होती चली गई। 


8 comments:

  1. सुजीत जी का प्रयास वाकई में प्रशंसा योग्य है |

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  2. आपका ये बरकपन है प्रिय मित्र!
    आपका ये प्रशंशा हमे आगे भी कुछ इसी तरह के कार्य के लिए प्रेरित करता है। दिल से धन्यबाद मेरे दोस्त🙏🙏
    आपका मित्र,
    सुजीत कुमार

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  3. बहुत बढ़िया मेरे मित्र सुजीत गुड़िया रानी को जन्मदिन की बधाई God bless you

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  4. आप का छोटा सा मित्र chandramani

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  5. आदरणीय सुजीत जी,
    मैं वर्तमान में वोल्वो में ही काम कर रहा हूं और आपके इस कदम की मुक्त कंठ से प्रशंसा करता हूं और आपको नमन भी करता हूं क्योंकि जिस प्रकार का आज का समय है उसमें हर कोई स्वार्थी हो जाता है परंतु आपने अपनी बिटिया के जन्मदिन को मनाने के लिए जो तरीका चुने हैं वह बिल्कुल काबिले तारीफ है और प्रशंसनीय भी और ऐसा बहुत कम लोग ही ऐसी महामारी के बीच में सोचते हैं।
    मुझे गर्व है आप पर कि मैंने आपके साथ में काम किया हूं।
    बिटिया अद्विका को जन्मदिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं रमेश अंकल की तरफ से और आपके स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की कामना करता हूं।
    आपका पूरा परिवार हमेशा खुश रहे यही प्रभु से कामना करता हूं।

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  6. बहुत बहुत आभार आप सबका। ऐसे नेक कार्यों की जितना सराहना की जाय कम ही हैं।

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