सस्ती और सुलभ ठिकाने की तलाश
अजमेर स्टेशन पर उतरने के बाद सस्ते और सुलभ ठिकाने की खोज में भटकने लगा। चूंकि मैं विद्यार्थी । मेरे पास इतने पैसे नहीं थे जिससे औसत दर्जे का होटल या गेस्ट हाउस ले सकता था। कई छोटे-मोटे होटलों में गया तो उसका भाड़ा जेब पर भारी पर रहा था। इसलिए ठहरने के लिए धर्मशाला की तलाश करना ही बेहतर समझा। इस दौरान कई उच्कों से भेंट- मुलाकात हुई जो शिकार की तलाश में भंवरे की तरह स्टेशन परिसर में मडंरा रहे थे। स्टेशन परिसर से बाहर निकलने के बाद एक दवा दुकानदार से धर्मशाला के बारे में पूछा। दुकानदार ने एक हिंदू धर्मशाला का पता बताया। उस दुकानदार ने कहा कि यह धर्मशाला पास में ही पृथ्वीराज मार्ग पर है। रात के नौ बजने वाले थे। ढूंढते-ढूंढते धर्मशाला के गेट पर आ धमके। तबतक काफी थक चुके थे। अपना रूम बुक कराया। थोड़ा सुस्ताने के बाद कुछ खाने के लिए बाहर निकला। पेट में चूहे फर्राटा दौड़ की तरह उधम मचाए हुए थे। उस रात प्याजीपूरी खाकर भूख मिटाया। अगले दिन किताबें पलटते रहे।आना सागर झील
मैंने परीक्षा केन्द्र जाने के क्रम में देखा कि बहुत सारे लोग एक विशाल जलकुंड के पास खड़े होकर चहलकदमी कर रहे थे। वहां बड़ी-बड़ी गाड़ियां खड़ी थी। रेहड़ी वालों की दुकानें लगी हुई थी।ये मेरे लिए किसी अचंभे से कम नहीं था। पहली बार झील अपनी आखों से देख रहा था। बाद में मालूम चला कि उसका नाम आनासागर झील है। मालूम हो कि आनासागर झील का निर्माण पृथ्वीराज चौहान के पितामह आनाजी चौहान ने पारहवीं शताब्दी के मध्य में करवाया था। आनाजी ने इसका निर्माण काराया था इसलिए इसका नाम आनासागर झील पड़ा।
अजमेरशरीफ और ढाई दिन का झोपड़ा
अगले दिन सुबह छह बजे के करीब सूफीसंत मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के लिए निकले। ख्वाजा गरीब-नवाज की दरगाह ज्यादा दूरी पर नहीं था। निजाम गेट से दरगाह के अंदर प्रवेश किया। मेरे पास कोई समान नहीं था। सिर्फ एक छड़ी जिसके सहारे मैं चलता था। दरगाह सुबह-सुबह पहुंच गए थे। लोगों की भीड़ थोड़ी कम थी। एक खादिम ने वहां कि रसमें पूरी कराई। ढा़ई दिन का झोपड़ा- दरगाह से बाहर निकलकर एक चाय की दुकान पर गया। वहां चाय पीया। दुकान पर टीवी लगी थी। ढ़ाई के झोपड़ा के बारे में बताया जा रहा था। दुकानदार से ढ़ाई दिन के झोपड़ा जाने का रास्ता पूछा। धूप काफी तीखी हो चली थी। ढ़ाई दिन का झोपड़ा काफी उंचाई पर है। इसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने कराया था। कहा जाता है कि इसका निर्माण ढ़ाई में कराया गया था। इसलिए इसका नाम ढाई दिन का झोपड़ा रखा गया। बता दें कि यह कोई झोपड़ा नहीं है बल्कि एक मस्जिद है।इसके बारे में अलग- अलग कई कहानियां सुनने को मिल जाती है।
पुष्कर मंदिर में पूजापाठ
उसी दिन पुष्कर के लिए दो बजे बस से निकले। पहली बार पहाड़ी रास्तों से सफर कर रहा था। बस स्टॉप से उतरने के बाद ऑटो मंदिर जाने के लिए लिया। महाभारत में पुष्कर राज के बारे में लिखा है कि तीनों लोकों में मृत्युलोक महान है। और मृत्युलोक में देवताओं का सबसे प्रिय स्थान पुष्कार राज दुर्भाग्य से पुष्कर सरोवर में स्नान नहीं कर पाया। देह पर जल छिड़कर ब्रह्मा मंदिर में पूजा अर्चना किया। रास्ता दुर्गम होने को कारण जल्दी निकल लिये। चूंकि आठ बजे मुझे दिल्ली के लिए निकलना था। इस तरह मेरी अजमेर और पुष्कर की यात्रा मंगलमय पूरी हुई।




Hum Station chorne Gye the bhaiya 😄😄
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteआपका यह वुतान्त मुझे भी वहां जाने के लिए उत्सुक कर दिया है।
ReplyDeleteआप सब का बहुत बहुत आभार।
ReplyDeleteसरल एवं दृश्यात्मक। जारी रखें।
ReplyDeleteYe padh ke to sahi me man ho rha h ki chla jaaye.
ReplyDeleteBht hi behtarin likha h aapne Mishra ji
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ReplyDeleteबहुत अच्छा। जीवन की यात्रा के दौरान ऐसी यात्राएं यादगार पड़ाव बनती हैं। यात्राएं करते रहिए। लिखते रहिये।
ReplyDelete...और फोटो भी खिंचवाया कीजिए।