अविनाश मिश्रा । ये हैं मनोहर बिन। हाजीपुर चौहट्टा के पास रहते हैं। वहीं इनका छोटा सा घर है जहां अपने परिवार के साथ ये अपना पुस्तैनी काम करते हैं । इनके घर में परिवार के सभी सदस्य डगरा बनाने और बेचने का काम करते हैं । लॉकडाउन से पहले सब कुछ ठीक चल रहा था। डगरा बनाने और बेचने से इतनी आमदनी हो जाती थी , जिससे इनका परिवार आराम से चल जाता था । डगरा बनाना और बेचना इनका पुश्तैनी कारोबार है। लेकिन लंबे दिनों तक चले लॉकडाउन ने इनके जीवन को बुरी तरह से प्रभावित किया। अब घर चलाने में बहुत परेशानी हो रही है। बड़ी मुश्किल से परिवार के सभी सदस्यों के लिए खाद्य सामग्री जुटा पाते हैं। मजदूरी करने के लिए कोई दूसरा काम नहीं मिल रहा ।अब इनके सामने भुखमरी की समस्या आ गई हैं।
सरकारी मदद अपर्याप्त ठहरी
मनोहर बिन कहते हैं कि जिनका नाम राशनकार्ड में था उन्हें अनाज मिला लेकिन जिनका नाम राशनकार्ड में नहीं था उन्हें नहीं मिला। अनाज मिला है।लेकिन घर चलाने के लिए इसके साथ पैसे की जरूरत होती है।हमलोग रोज कमाने और खाने वाले लोग हैं। इतने पढ़े लिखे भी नहीं कि अपने कागज पुर्जे को सही करा सकें । जो सहायता मिला वो परिवार चलाने के लिए अपर्याप्त हुआ। जरूत होती है तो किसी ऑफिस में जाते हैं तो बाबू लोग फटकार कर भाग देते हैं। हमारी कोई नहीं सुनता।
लॉकडाउन ने सब चौपट कर दिया
मनोहर बीन कहते हैं कि लॉकडाउन से पहले घर पर ही रहकर काम करता था। रोज इतना आमदनी हो जाती थी जिससे कभी कमी महसूस नहीं हुई। लॉकडाउन ने सब चौपट कर दिया। जीवन में पहली बार डगरा बेचने के लिए शहर से गाँव आया हूँ। शहर में खरीदारी करने के लिए बहुत कम लोग अपने घरों से बाहर निकलते हैं। आज सुबह ही घर से निकला हूँ।अभी तक दो जोड़ी ही बड़ी मुश्किल से बिक पाया है। तीन बजने को हैं और घर भी जाना है। दिखिये जितना डगरा लाये थे , जैसे का तैसे ही है। बिका ही नहीं। गांव में लोग कहते हैं आमदनी ही नहीं तो कैसे खरीदे। बड़ी उम्मीद के साथ शहर से गाँव आया था। निराश होकर वापस लौट रहा हूं।
( नोट- तीन बज रहे थे। अचानक ये गेट खोलकर अंदर आ गए। हमलोग अचंभित थे। पीने के लिए पानी मांगे। इसके बाद मेरी मां को पूरा वृतांत सुनाने लगे। मेरी माँ ने इन्हें खाना और पानी दी ।इसके बहुत ही भावुक होकर बोले आप लोग किसान हैं। इसकी जरूरत पड़ती होगी। एक जोड़ी ले लीजिए। जरूरत न होते हुए भी मेरी माँ एक जोड़ी डगरा खरीदी )
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