आजकल खरीफ का सीजन चल रहा है ...हमने भी इस बार ढाई एकड़ में धान का फसल लगाया है... पिछले साल कुछ कारणवश धान नहीं लगा पाया था ...लेकिन इस साल मौसम अनुकूल था... बारिश भी समय से होने लगी थी... बिचरे भी तैयार थे ...कुल मिलाकर सारे योग्य धान के खेती के अनुकूल थे... खेती किसानी में समय का बड़ा महत्व होता है ...इससे चुके तो पूरे साल खुद को कोसते रहिए.....जैसे अगर खेती कर लेते तो अच्छा होता... मेरी मति मारी गई थी जो हमने नहीं किया.... वगैरह - वगैरह ....अफसोस करने से अच्छा था कि धान की खेती किया जाए... नहीं करने से अच्छा होता है कुछ करना ....
हमारे आसपास के किसान राजेंद्र भगवती, पीबीएच 71 और 6444 ही मुख्य तौर से लगाते हैं
...हमने भी 6444 ही लगाया है ...गेहूं के फसल की कटने के बाद दो बार खेतों की जुताई किया गया... उसमें तीन हजार लगे...इसके बाद पानी के पटवन में 1500 लगे...इस पटवन के बाद एक बार फिर से खेतों की जुताई की गई उसमें दो हजार लगे ....₹160 कट्ठे की दर से धान की फसल के बिचड़े की रोपाई की गई... मतलब 4800 सौ रोपाई करने में लगे...अभी तक खाद बिल्कुल नहीं डाला गया है... आप इसे जैविक फसल भी बोल सकते हैं... लगभग 15 दिनों के बाद खरपतवार निकाला जाएगा...इसके बाद पानी का पटवन करके थोड़ा सा डाला जाएगा...फिर एक निश्चित अंतराल पर बार बार पानी का पटवन किया जाएगा ...अगर पांच बार पानी का पटवन किया गया तो 15 सौ हर बार लगेंगे... इस पर कुल मिलाकर 9,000 खर्च होंगे...खुद की मेहनत अलग से...और हां एक जरुरी चीज तो छूट ही गया... बीच तो बाजार से खरीदा था... उसका अलग से था...वह तो छूट ही गया था... अब सोचिए अगर उच्च कोटि की फसल हुई तो कितना उपज होगा...ढाई एकड़ धान की फसल में कुल उपज अधिकतम हमारे तरफ 100 मन होता है...हमने जो श्रम किया वह अलग ही रहा...लेकिन मेरे पिताजी की जिद्द थी कि धान की खेती करनी है तो करनी है... इसलिए करना पड़ा... उनका कहना है कि मोदी जी किसानों को 6000 जो देते हैं उनका सदुपयोग किया जाना चाहिए... वह पैसा हराम का थोड़े ही होता है कि उसे निकाल कर खा लिया जाए या फिर किसी दूसरे काम में खर्च किया जाए.....
खैर, ये बाद की बात है ...फसल डूबने का भी खतरा बना रहता है... इसके बाद आजकल टिड्डियों का भी आतंक बना हुआ है...न जाने कब वह निकल पड़े...और खेतों में लगे फसलों को चट कर जाए... लेकिन खेती किसानी तो एक तरह का जुआ होता है...मेरे दादाजी भी खेती किसानी को जुआ बोलते थे... यह एक कैसा जुआ है जो जानबूझकर खेला जाता है...और हर बार खेला जाता है... इस उम्मीद के साथ खेला जाता है कि जीत पक्की है...लेकिन जीत और हार तो ऊपर वाले के हाथ में होती है...हम तो बस अपना कर्म करते हैं...और हर बार करते हैं।


No comments:
Post a Comment