कांग्रेस पार्टी को अपने युवा नेताओं को उपेक्षित करना महंगा पड़ रहा है। पहले एमपी में और अब राजस्थान में महत्वकांक्षाओं की लड़ाई सियासत के मैदान में चल रही है। नए पौध तैयार करना और भविष्य के लिए संगठन को मजबूत करना अनुभवी नेताओं की महती जिम्मेदारी होती है।समय समय पर राजनीति के छत्रसाल को त्याग करने से चूकना नहीं चाहिए।लेकिन ऐसा लगता है कांग्रेस की प्रयोगशाला में रसायन की कमी हो गई है।कई मौके पर निर्णय लेने में असमंजस की स्थिति से पार्टी को भारी नुकसान भी उठाना पड़ा है।
कांग्रेस पार्टी के अंदर युवा नेताओं में असंतोष
कांग्रेस पार्टी के अंदर युवा नेताओं में असंतोष बढ़ रहा है। उन्हें महसूस हो रहा है कि संगठन उनका उचित मूल्यांकन करने में अक्षम प्रतीत हो रहा है।कांग्रेस को जगनमोहन रेड्डी मामले से सीखना चाहिए था। उसे हेमंत बिश्वाशर्मा को भूलना नहीं चाहिए था।लेकिन एक के बाद एक कई मौके पर कांग्रेस से भारी चूक हुई। और जिसका परिणाम हुआ कि सौ साल पुरानी यह पार्टी लगातार खोखली होती रही।
ताज़ा मामला राजस्थान कांग्रेस संगठन में मचे उथल पुथल से है।वर्तमान घटना की नींव दो साल पहले ही पड़ गई थी जब पायलट की मेहनत पर पानी फेरते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व सीएम गहलोत अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर मुख्यमंत्री बन गए ।राजस्थान में संगठन को मजबूत बनाने और युवाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने पायलट को बड़ी जिम्मेदारी दी।
इस मौके को भुनाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। पायलट के मेहनत का ही नतीजा था कि कांग्रेस राजस्थान में सरकार बनाने में सफल हुई।एक समय तो ऐसा लग रहा था कि पायलट ही सीएम पद को सुशोभित करेंगे । राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी गहलोत समीकरण बैठाने में सफल रहे । पायलट को पीछे धकेलते हुए खुद सीएम बन गए।उस समय पायलट को खुश करने के लिए पार्टी ने सरकार में उपमुख्यमंत्री का पद दिया। साथ ही गलहोत सरकार में वह मंत्री भी बने।लेकिन गहलोत- पायलट के बीच संगठन और सरकार में वर्चस्व के लिए शीतयुद्ध अंदर ही अंदर चलता रहा।
संगठन और सरकार में वर्चस्व के लिए शीतयुद्ध
सरकार बनने के बाद से ही पायलट को महसूस कराया जाता रहा कि उनकी अहमियत कितनी है। इससे पायलट अंदर ही अंदर घुटते रहे। उनकी नाराजगी इस बात से भी है उनके लोगों को पार्टी प्रमोट नहीं कर रही। गहलोत राजनीति के मजे हुए खिलाड़ी हैं।वह जानबूझकर खतरों के खिलाड़ी बनाना नहीं चाह रहे। अभी तक हमेशा सेफ जोन में रहकर ही विरोधियों को धूल चटाते रहे हैं। वह पायलट के करीबियों को अपनी सरकार में जगह देकर ख़तरा मोल लेना नहीं चाह रहे ।
दरअसल राज्यसभा चुनाव के समय भी दोनों नेताओं के बीच तनाव चरम पर था।लेकिन कांग्रेस पार्टी मामले को किसी तरह शांत कराने में सफल रही। पिछले छह सालों से पायलट राजस्थान में कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बने हुए हैं। संगठन पर उनकी पकड़ मजबूत है। अब यह देखना लाज़मी होगा कि अगर यह लड़ाई लंबी खिचतीं है तो पायलट सेफ लैंडिंग करते हैं या विमान कोई और हाइजेक कर लेगा।
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