Thursday, June 3, 2021

चिड़ियों की चहचहाट व पक्षियों के कलरव हुए गुम

  • पक्षियों की घट रही संख्या का पर्यावरण पर पड़ रहा है बुरा असर
  • सुबह में मन मस्तिष्क को उनकी आवाजों से मिलती थी स्फूर्ति 

ग्रामीण क्षेत्रों में पक्षियों की घट रही संख्या का पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। सुबह और शाम में घरों की मुंडेर तथा पेड़ों के झुरमुटों में अब चिड़ियों की चहचहाट व पक्षियों के कलरव नहीं सुनाई दे रहे हैं। घर में बसने वाली गौरेया हो या तोता मैना पंडूक हो या कबूतर कठखोलवा हो या कोयल पपीहा हो या खंजन, इनकी संख्या  घटती जा रही है। ये पक्षी पहले सुबह शाम अपनी मधुर आवाजों से वातावरण को गुंजायमान बनाते थे। भोर में सोकर जगने वालों के मन मस्तिष्क को उनकी आवाजों से गजब की स्फूर्ति मिलती थी। लोगों की सुबह की शुरूआत एक स्वस्थ मनोरंजन के साथ होती थी। लेकिन, अब इन चिड़ियों की सुरीली आवाज लुप्त हो गई है।

ग्रामीण अभिमन्यु यादव ने बताया कि पक्षियों की कम होती संख्या का पर्यावरण पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। ये पक्षी कीड़े मकोड़े को खाकर पर्यावरण का संतुलन बनाने में मददगार साबित होते थे। इनकी संख्या कम होने से कीटों की भरमार होती जा रही है, जो फसलों व सब्जियों को चट कर जा रहे हैं। मानव मित्र इन पक्षियों की कमी के कारण कई तरह की समस्याएं पैदा होने लगी है।

ग्रामीणों ने कहा कि  हारियल सुग्गा  पनडुब्बी मथमैनी महुवर जैसी पक्षी अब देखने को नहीं मिलते हैं। तीतर बटेर जैसी पक्षी शिकारियों की भेंट चढ़ चुके हैं। पक्षी प्रेमी विवेक रसिक व राधेश्याम शर्मा का कहना है कि सबसे अधिक पक्षियों को नुकसान फसलों में प्रयोग की जाने वाली कीटनाशकों दवाओं के छिड़काव से हुआ है। चिड़ियों की प्रजातियों का अंत इन्हीं कीटनाशकों दवाओं के कारण हुआ है। अब इन चिड़ियों की कमी  लोगों को खलने लगी है। सरकार तथा समाज को इन पक्षियों की सुरक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए।   

  

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