
मेरे दादाजी गुलाम भारत में पैदा हुए थे। वह अपने माता-पिता के पहली संतान थे। दो भाई और दो बहन थे। इस कारण पारिवारिक कुनबा काफी बड़ा था। अमुमन जैसा ग्रामिण परिवेश में होता है। कई पीढ़ियों के लोग एक साथ रहते थे। मकान मिट्टी के थे जिसके अवशेष आज भी मौजूद हैं। उस समय मकान छोटे-छोटे होते थे लेकिन लोगों के दिल बड़े होते थे। अब दादाजी के पीढ़ी का कोई जीवित नहीं है। ऐसे में उनकी यादें आंखों के सामने तैरते रहते हैं। उनके विचार सबलता प्रदान करते हैं। आपसी तालमेल और सुझ-बुझ से समस्याओं के समाधान निकालने की कुशलता हमें गर्व का भान कराती है। उनके विचारों में स्थिरता था। उनका अधिकारिक नाम विश्वनाथ मिश्रा था लेकिन आस-पड़ोस के लोग उन्हें दुल्ला मिश्रा के नाम से पुकारते थे।मैंने जब होश संभाला तब दादाजी बुढ़ापे के दहलीज पर दस्तक दे चुके थे। लेकिन ताकत इतना था कि किसी को भी धुल चटा दे। फिर भी वह लड़ाकू प्रवृत्ति के नहीं थे। उनको कभी गुस्सा नहीं आता था। चित्त बिल्कुल शांत था। वह बिहार सरकार में चतुर्थवर्गीयकर्मी थे। लेकिन रूतबा किसी अधिकारी से कम नहीं था। वे एक कुशल वक्ता थे। घंटों किसी भी मुद्दे पर बात करते लेकिन चेहरे पर शिकन आने देते थे। उनके जीवनकाल का एक लंबा समय हाजीपुर नजारथ- प्रसाखा में बीता। युुनियन में गहरी पैठ रखते थे। वह कर्मचारी युनियन के नेता थे।
उद्यमशील इंसान थे
दादाजी कर्म करने पर विश्वास करते थे। उन्हें ढकोसला सेे सख्त नफरत था। वह उद्यमशील इंसान थे। आम के व्यापारी थे। हमारा आम देवरिया, बनारस, हजारीबाग, टाटा, बिहारशरीफ, और गोरखपुर आदि शहरों में जाता था।उनका खेती-किसानी से बड़ा लगाव था। जमकर खेती करने वाले इंसानों में से वह भी एक थे। अक्सर मुझे ्ंअपने साथ खेतों पर ले जाते थे। मैं वहां उनसे हजारों सवाल करता और वह मेरे प्रत्येक प्रश्न का जवाब देते थे। उनके व्यक्तित्व का व्यापक प्रभाव मेरे जीवन पर पड़ा है।
खेती-किसानी से था विशेष लगाव
दादाजी 31 दिसबंर 1996 को सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद से उन्होंने अपना पुरा ध्यान खेतीबाड़ी और गौ-सेवा में लगाया। मैने पहले देखा था मेरे यहां एक जोड़ी भैंस हमेशा रहता था। लेकिन आजकल गाय पालते हैं। भैंस पालना गाय की अपेक्षा सस्ता होता है। और आमदनी थोड़ी अच्छी हो जाती है। वे मवेशियों का नाम रखते और उसके नाम से पुकारते थे। जब वो जीवित थे तो एक गाय के बच्चे का नाम लाली रखे थे। लाली अब बड़ी हो चुकी है। 26 अक्टूबर 2020 को लाली ने एक बच्चे को जनम दिया। देखने में वह बच्चा बहुत ही सुंदर लगता है। उसका नाम मगंरू रखा गया है क्योंकि मंगलवार के दिन उसका जन्म हुआ है।
भोजन के थे शौकीन
दादाजी भोजन के बहुत बड़े शौकीन थे। खाने-खिलाने से कभी पीधे नहीं हिचकते थे। केला- दूध और केला के साथ दही खाना उन्हें बहुत पसंद था। चाय मेरे घर में सभी लोग पीते हैं। सबके चाय के आदी होने में उनका बड़ा योगदान है। वह बीस कप चाय पी जाते। कभी भी चाय के लिए मना नहीं करते । आप उन्हें चाय पीलाते रहीये वह मना नहीं करते । कोई कभी भी मेरे घर आ जाए अतिथियों का स्वागत चाय पीलाकर करते थे। किसी की मजाल था कि वह मना कर दे। एक-दो बार को छोड़कर आजीवन स्वथ्य रहे। जवानी के दिनों में पहलवानी करने के भी उनका शौक था। जमकर पहलवानी करते। जीवन के अंंतिम दिनों में बीमारियों ने ऐसा जकड़ा कि वह अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह को तोड़ नहीं सके। 21 फरवरी 2019 की मनहुस रात ने जीवन में अंधेरा कर दिया। और वो हमें छोड़कर इस दुनिया से चले गए ।